आल्हा छंद
हमर देश के बीर सिपाही,जान लुटा के आन बचाय।
बैरी थरथर थरथर काँपय,एक बार जे आगू आय।
गन गोला हथियार धरे हे, अउ धर रक्खे हवय कटार।
कफ़न बँधाये रहिथे हरपल,लड़े मरे बर हे तइयार।
भीमसेन कस भुजा फरकथे,बम लागे जस गदा प्रहार।
छर्री दर्री बैरी होजय,एक बार जे करदय वार।
गन ले गोली अइसे निकले,जइसे अर्जुन के हे बाण।
लक्ष्य भेद ओ करके रहिथे,नइ बाँचय बैरी के प्राण।
चमचम चमचम चमकावत हे, जस सहदेव नकुल तलवार।
तइसे रण मा वीर सिपाही,बिजुरी जस दे मार कटार।
बड़ा प्रतापी बड़ बल साली ,भारत के सेना ला जान।
गरजत घुमड़त घटा बरोबर,बैरी बर हे काल समान।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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