लावणी
गरुवा घुरुवा अउ बारी के,जब चिंता हावय भाई।
पाँच रुपइया किलो गोबर,ले लव चिंता मिट जाई।
बीच सड़क मा गरुवा बइठे,देखे बर तक नइ पाबे।
घर घर जम्मो रहे बंधाये, जेन गली मा तँय जाबे।
दुरघटना ले तको बचाही, नइ होवय फिर करलाई।
पाँच रुपइया किलो गोबर,लेलव चिंता मिट जाई।
गोबर ले फिर गैस बना के,घर घर मा चूल्हा बारव।
लकड़ी छेना बंद करव अउ,पेंड़ कटाई ला टारव।
गोबर खातिर खार खार फिर,नइ भटकय दाई माई।
पाँच रुपइया किलो गोबर,लेलव चिंता मिट जाई
फिर से दूध दही के नदिया,गाँव गली पावन करही।
कर दीही सब दूर मिलावट,घर घर मा पइसा भरही।
घुरुवा ले बारी हरियाही,मगन होय फिर भौजाई।
पाँच रुपइया किलो गोबर,लेलव चिंता मिट जाई।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
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