आल्हा (पहिली हवाई यात्रा )
संगी साथी संग टूर मा,गोवा जाये बर तइयार।
टिकिट कटाये हन जहाज के, आज बइठबो पहिली बार।
गेन रायपुर के माना मा,जिहाँ रखावत रहे जहाज।
रहे विवेकानन्द नाम से,जे भारत के हावय ताज।
झोला झँगड़ी देख एक झन,बोलिस ओ सब येती लान।
रखदे येमा जाँच करे बर, भीतर के होही पहिचान।
जाँच कराके चलत रहन ता,कहिथे ये सब जमा कराव।
अपनो जाँच कराये खातिर, बिन झोला के येती आव।
जम्मो पइसा, बेल्ट मुबाइल,डब्बा मा ओमन रखवाय।
पुरजा पुरजा जाँच करत हे, तब भीतर कोती बुलवाय।
हम सब संगी सोंचत राहन, झोला हर कइसे नइ आय।
बिन झोला के काम बने नइ,सोंच सोंच मनवा पछताय।
खड़े रहन सब आगू पाछू, ततके बेरा बस हर आय।
सब जहाज मा जाबो सोंचन,जाने बस काहाँ ले जाय।
दू मीटर मा लेग उतारय,खड़े रहय गा जिहाँ जहाज।
भारी भरकम देख जहाजे,मन हर गदगद होगे आज।
सीढ़ी चढ़ फिर भीतर पहुँचे, ठंडा ठंडा अबड़ सुहाय।
आगी बारे कस तक लागय,बिक्कट धुँआ धुँआ कस छाय।
गोरी चिट्टी टूरी मन हा,अँगरेजी हिंदी बतियाय।
सुग्घर सुग्घर रूप देख के,मन मोरो अबड़े हरसाय।
कनिहा मा पट्टा ला बांधे,फिर जहाज हर दौंड लगाय।
जाने कब ऊपर उड़ियागे,खिड़की देख समझ मा आय।
घर कुरिया मन कुँदरा लागय,मनखे तनिक नजर नइ आय।
तरिया नदिया डबरा होगे, रुख राई तक नइ चिनहाय।
जतके ऊपर ऊपर जावय,ततके भारी कान पिराय।
अब तो खड़ा होय कस लागय,का होवत हे समझ न आय।
बादर के हे दिखे बिछौना,पोनी जइसे रहे बिछाय।
बिजुरी चमकत मा जब जावय,तब जहाज हर तक हिल जाय।
बादर अउ बादर बस दिखथे,अउ काँही हर नजर न आय।
बिन बादर मा गाँव दिखत हे, कोन गाँव ये कोन बताय।
काफी पीबो मन हर होगे, सौ रुपिया तब भाव बताय।
भारी मँहगा हे समान सब, तब ले मनखे मन खजवाय।
झटकुन हमला पहुँचा देइस,देख मुंबई के दरबार।
फिर जहाज ले गोवा पहुँचे, इही यातरा के हे सार।
गोल घुमावत पट्टा कोती, हमला ले के खड़ा कराय।
जेन रायपुर मा हम छोड़े,ओ झोला सब इहचे आय।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
2-11-2019
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