Sunday, 18 October 2020

सार छंद

सार छंद 

मनखे के स्वारथ छोड़े ले,धरा सरग बन जाही। 
जइसन सुख वो सोंचे नइ हे, तइसन तक सब पाही। 

धरती पहिली सरग रहिस हे,रहिस देव के डेरा।  
सरग परी मन घूमे आवय,जावय करके फेरा। 

निरमल पावन जलधारा हर,कलकल गीत सुनावय। 
चिरई चिरगुन पेड़ जनावर,सबके मन ला भावय। 

नदिया के ये पानी जम्मो,आज प्रदूषित होगे। 
मनखे के करनी ला देखव,सबो जीव हर भोगे। 

स्वच्छ हवा तनमन ला मोहय,जीव जगत हरसावय। 
जंगल झाड़ी बाग बगीचा,झूम झूम लहरावय। 

आज पेड़ हर सबो कटागे, धुँआ गगन भर छागे। 
मनखे के स्वारथ के सेती, अइसन दिन हर आगे। 

माटी ले सोना उपजावन,आज रेत कस होगे। 
बिना जहर अब कुछ नइ होवय,करनी मनखे भोगे। 

पहिली जइसे दिन लायेबर, पेंड़ लगावव भाई। 
जिनगी खातिर स्वारथ छोड़व,पाटव जिनगी खाई।

रचना-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

No comments:

Post a Comment