सनाई छंद
मुझे मार कर मरजाने से,अच्छा है खुद हीं मर जाओ।
या जीवन की राह पकड़ कर,कोई दूजे को अपनाओ।
मैं अपनी करनी को भोगूँ, तुम क्यों अपना हाथ जलाओ।
मेरी राहें मेरी मंजिल, तुम अब अपना राह बनाओ।
सोंच बदल कर देखो अपनी, मुझमें अब तुम क्या पाओगे।
मेरे पद चिन्हों में चलकर, जो मेरे पीछे आओगे।
रोक सको गे ना तुम मुझको, जो हतकण्डा अपनाओगे।
मेरी मंजिल और कहीं है, मत आना तुम पछताओगे।
मेरी करनी जान चुके हो, अब ना तुम मुझको भाओगे।
मैं जिन राहों में चलती हूँ, उन राहों पे क्या आओगे।
ठोकर ही ठोकर अब खा कर, गुस्सा मुझपे दिखलाओगे।
माफ करो मुझको ऐ साथी, आशा है तुम सुख जाओगे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
No comments:
Post a Comment