लाल बहादुर शास्त्री
निःस्वार्थ सेवा में रमे, करते रहे नित काम जो।
वो लालबहादुर शास्त्री थे,पहचान शास्त्री नाम जो।
इक ओ कहानी याद है, मंत्री रहे जब रेल के।
माँ को बताया था नही, करता रहा सब झेल के।
कहता रहा मैं रेल में, करता हूँ निशदिन काम माँ।
रहता हमेसा ब्यस्त हूँ, मिलता नही आराम माँ।
इक बार माँ भी आ गई, था एक उद्घाटन वहाँ।
वो पूछती हर एक से, बेटा बता मेरा कहाँ।
पूछा किसी ने नाम क्या, माई तुम्हारे पुत्र का।
है लाल बहादुर शास्त्री, बेटा मेरे सुपुत्र का।
सब हो अचंभा देखते, उसको दिखाया दूर से।
माँ ने कहा हाँ है यही, चमका नयन भी नूर से।
फिर शास्त्री से पूछा गया, वो कौन है जो है वहाँ।
तब देख शास्त्री ने कहा, माँ है मेरी लाओ यहाँ।
शास्त्री किए कुछ बात फिर, माँ भेज दी घर के लिए।
सब ने कहा माँ को सहीं, सच क्यों बता फिर ना दिए।
कह दूँ अगर मैं मंत्री हूँ, करती सिफारिश वो सदा।
फिर टाल मैं सकता नही, मैं बोझ से रहता लदा।
ऐसे कहाँ नेता अभी, ऐसा कहाँ सरकार जी।
सब स्वार्थ में लिपटे रहे, अपना करे उद्धार जी।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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