Thursday, 1 October 2020

सवैया

दिलीप कुमार वर्मा के सवैया छंद

सुखी सवैया

मरहा खुरहा जिन लागत हे, उन ला कमजोर कभू झन जानव।
उँखरे तन मा बड़ जोश भरे, उन अंतस के मनखे पहिचानव।
धर के पटके हथनी तक ला,जब ठान रखे सिरतो तुम मानव।
पतला जब देख लड़े झन जा,अउ मोठ दिखे समझौ झन दानव।

महा भुजंग प्रयात सवैया

बुढापा चले ना दवाई बिना जी,सबो काम होथे मिले जे दवाई।
कहाँ दाँत पाबे चबाही कहाँ ले,न आँखी दिखे कान भैरा कहाई। 
न रेंगे सके पाँव भारी पिराथे,लगे टूट गेहे ग हाड़ा ह भाई।
बुढापा भले आय हावै इहाँ जी,तभो आज भी याद आथे ग दाई।

बागीश्वरी सवैया
सफाई रखौ गाँव चारो मुड़ा ले,त बीमार कोनो ग होवै नहीं।
भराये रहै जेन गड्ढा म पानी,बने लान माटी ल पाटौ सहीं।
बने जेन नाली रुके जी न पानी,करौ चेत झिल्ली रहे ना कहीं।
बसेरा करे कोन गाँवे म जाके,जिहाँ गन्दगी हे बतादे तहीं।

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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