Tuesday, 20 October 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 22                 

सोज रसता म चले आ जाबे। 
देख के साँझ ढले आ जाबे।  

कोयली कूक अभी पारत हे। 
जइसे ही आम फले आ जाबे।  

तोर रसता ल निहारत रइहँव।
रात के दीप जले आ जाबे।   

घाम के बेर कहूँ आना हो।
आम के छाँव तले आ जाबे। 

मोर हालत म दया झन करबे।
छाती मा मूंग दले आ जाबे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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