Saturday, 17 October 2020

गजल

गजल-दिलीप कुमार वर्मा

बहरे रमल मुसद्दस मख़बून मुसककन
फ़ाइलातुन फ़यलातुन फ़ेलुन

2122 1122 22                 

साँच ला आँच कहाँ आवत हे। 
एक दिन झूठ ह बर जावत हे। 

झूठ कतकोन करे चालाकी। 
एक ना एक घँ पकड़ावत हे। 

पूछ परबे ग अचानक काँही। 
जेन गलती करे घबरावत हे।

चोर पकड़े ल सिपाही घूमे।
भूले भटके ल धरे लावत हे। 

जेन देवत रथे निशदिन धोखा।
लोग अइसन ल कहाँ भावत हे।

मोर घर तोर बसेरा हावय। 
खोजथे लोग कहाँ पावत हे। 

माँग के भीख  गुजारा करथें। 
रोज कुकरी बिसा के खावत हे।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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