Thursday, 1 October 2020

सखि छंद

सखी छंद  पथरा

पथरा हावय बड़ भागी।नइ लागय ओला दागी।
कतको छीनी मा मारै। पर पथरा हर नइ हारै।

धरती मा हावय भारी।लाली सादा अउ कारी। 
कोड निकालत हे ओला। टोरत फोरत हे चोला।

नींव बनाय अटारी के। परदा बनथे बारी के।
सड़क बने बर बिछ जाथे।पचरी बन के सुख पाथे।

जाँता ले रोटी खाले।सिलपट्टा चटनी पाले।
बेलन चौकी बन जाथे।सब पथरा ला सहराथे।

पुलिया बनथे नाली के। आमा टोरय डाली के।
टूट बने पथरा रेती।काम हमर आये सेती।

चमचम कुँआ बँधाये हे।पूल नदी के भाये हे।
अँगना कुरिया परछी मा।कटे न भाला बरछी मा।

लाल किला हे लाली के।झन समझव ये काली के।
ताजमहल हावय सादा।जग मा जे चर्चित जादा।

पथरा के ताँबा लोहा।लागय पथरा बन कोहा ।
सिरमिट बनथे पथरा के।खान बने सब खतरा के।

पूजत हे मनखे तोला।देव असन करके चोला।
भगवन ला खोजत हावै।देख सबो मन सुख पावै।

बिन पथरा के का होही।रीड़ धरा अपने खोही।
धरती दलदल बन जाही।जीव जगत सब दुख पाही। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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