Sunday, 18 October 2020

चौपाई

    ठेकला 

बचपन के सुरता जब आथे। आँखी ले आँसू झर जाथे। 
कतका सुग्घर दिन वो राहय।बाल देख हीरो सब काहय।

मुड़ मा करिया बाल भराये। पाय हवा दिनभर लहराये। 
जेमन देखय ते मन भावय। चार चाँद मुखड़ा लग जावय। 

लम्बा लम्बा बाल बढ़ाये। बच्चन जइसे कटिंग कराये। 
हीरो जइसे बाल सँवारन। केश सँवारे बर नइ हारन। 

तरिया मा जब जाय नहावन। मुड़ी हला के बाल सुखावन। 
तेल डार चम्पी तक भावय। फिर कंघी सुग्घर सपटावय।

लीख जुआँ कतको छबड़ाये। फिर भी बाल मुड़ी मा छाये। 
जब मुंडा होये बर लागय। मन हर येती तेती भागय। 

कोनो ला मुंडा जब देखन। रसता रेंगत ओला छेंकन। 
टकला मुंडा कह चिड़हावन। मुंडी मार बड़ा सुख पावन। 

धीरे धीरे समय गुजरगे। मुड़ ले चुन्दी जम्मो झरगे। 
अब तो बाल रहे नइ भाई। टकला मुंडा आज कहाई। 

बाल बचाये खातिर कतको। उदिम करे हन कहिथे जतको। 
अंडा लहसुन गोबर थोपे। अब तो शेष बचे हे रोपे। 

मँहगा मँहगा तेल लगा के। देख डरे हन सब अजमाके। 
एक ताग तक नइ जामत हे। बचे हवय उँखरो सामत हे।

सबके संगी इही कहानी। दोष देत हे सबझन पानी। 
पर कारण कोनो नइ जानय। मति अनुसार सबोझन तानय। 

आज ठेकला सबझन होगे। नाई तक कैंची रख सोगे। 
अब का चिंता करना भाई। टकला के हाबय अधिकाई। 

दोहा 

होके देखव ठेकला,खुशी मिले भरपूर। 
लीख जुआँ रूसी सबो, हो जावत हे दूर। 

ऊपर वाला सोंच के,करत हवय सब काम। 
सब ला करके ठेकला, अपन लेगही धाम।

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार 19-11-19

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