Thursday, 29 October 2020

बाल कविता

बाल कविता 

मेरे घर हाथी गर होता, बैठ सैर को जाता। 
पक्के-पक्के आम तोड़ कर, बैठ मजे से खाता। 

कुत्ता भौंके जो पीछे से, पर मैं ना घबराता। 
बड़े चैन से ऊपर बैठे, ताली खूब बजाता। 

मेरे आगे सारे बच्चे, बौने से हो जाते। 
हमे बिठालो ऊपर कह के, मेवा मिश्री लाते। 

पर मैं हाथी ऊपर बैठे, गर्दन जरा हिलाता। 
जग नही है ऊपर कह के, सब को बहुत चिढाता।

नदी रहे या जंगल झाड़ी, सब को पार लगाता। 
सैर सपाटा करता दिन भर, साँझ ढले घर आता।  

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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