Sunday, 18 October 2020

दुमदार दोहे

दुमदार दोहे 

काँव काँव कउवा करे,बइठ अटारी मोर। 
लगथे पहुना आय घर,तभे करत हे शोर। 
बरा बर दार फिलोहूँ। 
नही ते रोटी पोहूँ। 

भाँव भाँव भूँकत हवय,कुकुर गली मा आज। 
लगथे चोर हमाय गे,अपन करे बर काज। 
धरे लाठी मँय जाहूँ। 
चोर ला खूब ठठाहूँ। 

म्याऊँ म्याऊँ बोल के,घर मा खुसरत आय। 
दूध दही ला देख के,तुरते चट करजाय। 
कहाँ मुसुवा ओ पाथे। 
बिलाई बड़ा सताथे। 

जब ले जंगल काट के,कर दिन हे वीरान। 
तब ले देखव बेंदरा,करे अबड़ परसान। 
घरो घर रार मचाथे। 
साग भाजी ला खाथे। 

भर्री भाँठा छेंक के,धनहा सबो बनाय। 
गरुवा चारा बर सखा,बता कहाँ अब जाय। 
खेत भर घूमय खावय। 
सड़क मा रात बितावय। 

शेर मार के खाल ला, बेंचय ऊँचा दाम। 
हाथी दाँत निकाल के,अपन बनावय काम। 
कहाँ जंगल मा राजा। 
बने मनखे के खाजा। 

उत्पादन के मोह मा, खातू देत ढकेल। 
कीरा मारे के दवा,डारत हावय पेल। 
अन्न मा जहर ह भरगे। 
चिरइया मन सब मरगे। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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