दिलीप कुमार वर्मा के सवैया
किरीट सवैया नींव
नींव बनाय भरे पथरा,घर हा तब हीं बन पावत हावय।
लोग सबो ल भुलाय जथे,कतको गहिरी म दबावत हावय।
जे पुरखा मन काम करे,तिन ला अब लोग भुलावत हावय।
बाढ़त हे घर ऊपर मा घर,नींव सबो बिसरावत हावय।
चकोर सवैया
नोंचत खावत हे गिधवा,मुड़ मा बइठे मुरदा कर कान।
लेवत हे रस नाक चबावत,बाँच सके कुछ ना अब जान।
ये गिधवा नइ सोंचत हे, उन जीवत मा कतका ग महान।
ये तन हा कुछ काम न आवय,जावय जीव उड़े जब प्रान।
अरसात सवैया
जोहत हे रसता बपुरी,जब ले अवलाद गये घर छोड़ के।
आय नही बरसों गुजरे,जब ले चल दे उन हा मुख मोड़ के।
का उन पावत हे बतला,परदेश बसे अपनों दिल तोड़ के।
मात पिता ह बलावत हे, अब आ बिटुवा बिनती कर जोड़ के।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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