Sunday, 18 October 2020

गजल

गजल 
2122  2122 2122 

जिंदगी के जंग में हारे हुए हैं।
ये सभी तकदीर के मारे हुए हैं।

बोलना तो चाहते हैं पर करें क्या?
खौफ से सब मौन बेचारे हुए हैं।

चाँद समझा जिस कली को देख सब ने।
ब्याहता बनते हि अंगारे हुए हैं।

इन भटकती रूह को कुछ चैन आये। 
देख मधुशाला सभी प्यारे हुए हैं।

कौन जाने कब कहाँ ठहरे मुसाफिर।
राह भटके ज्यूँ नदी धारे हुए हैं।

दिन निकलता है भटकती राह इनकी। 
रात घर जाते सभी हारे हुए हैं। 

कौन समझाये उसे जो घर उजाड़े। 
शेरनी बन शेर को मारे हुए है।

ओ कभी इनको बुलाए प्यार से घर।
आस रख सब देख मुँह फारे हुए हैं। 

घर चलाना हो गया मुश्किल करें क्या?  
जिंदगी में जल सभी खारे हुए हैं। 

दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदा बाजार

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