गजल
2122 2122 212
मोर घर ला देख के घबरा जथे।
कोन कहिथे सुख सबो घर आ जथे।
बाँस बल्ली मा टिके छान्ही हवय।
जब कभू आथे हवा उड़िया जथे।
जब बरसथे बून्द पानी के इहाँ।
खाट तक डोंगा बने उफला जथे।
जाड़ मा जस देंह ठिठुरे कटकटा।
मोर घर दीवार हर थर्रा जथे।
घाम बर छइहाँ बने सबके महल।
मोर घर भितरी सुरुज हर आ जथे।
चेरका हन दे हवय दीवाल हा।
देश के नक्शा बने मन भा जथे।
खाय खातिर तोर घर होही सबो।
मोर घर पसिया तको सरमा जथे।
डेहरी ले जे भगाये हव अपन।
मूँड़ बर सब छाँव इहँचे पा जथे।
का मिले कखरो करा रो के दिलीप।
मौत सब ला एक दिन तो खा जथे।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार छत्तीसगढ़
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