बाल कविता
रात अकेले डर लगता है।
तन सोता आँखें जगता है।
होती आहट घबराता हूँ।
चादर अंदर छुप जाता हूँ।
हवा चले जब सर-सर सर-सर।
काँपे जिवरा थर-थर थर-थर।
उल्लू बोले बैठ अटारी।
फिर हालत बिगड़े हैं भारी।
मन कहता आवाज लगाऊँ।
हो कोई तो पास बुलाऊँ।
पर मुख से आवाज न आये।
डर से पूरा तन थर्राये।
फिर दरवाजे आहट आई।
मम्मी आकर मुझे जगाई।
अब क्या मैं हालात बताऊँ।
कैसी बीती रात बताऊँ।
रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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