Monday, 19 October 2020

बाल कविता

बाल कविता 

रात अकेले डर लगता है। 
तन सोता आँखें जगता है। 

होती आहट घबराता हूँ। 
चादर अंदर छुप जाता हूँ। 

हवा चले जब सर-सर सर-सर। 
काँपे जिवरा थर-थर थर-थर। 

उल्लू बोले बैठ अटारी। 
फिर हालत बिगड़े हैं भारी। 

मन कहता आवाज लगाऊँ। 
हो कोई तो पास बुलाऊँ। 

पर मुख से आवाज न आये। 
डर से पूरा तन थर्राये।  

फिर दरवाजे आहट आई। 
मम्मी आकर मुझे जगाई।

अब क्या मैं हालात बताऊँ। 
कैसी बीती रात बताऊँ। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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