अमृत ध्वनि छंद
काखर कहना मान के, करे हवस तँय काम।
फँसा डरे परिवार ला, डुबो दिए तँय नाम।
डुबो दिए तँय, नाम सबो के, कचरा करदे।
टी वी वाले, पाछू पर गे, बइठे गर दे।
कइसे बँचबो, तही बता अब, मुसकिल रहना।
साँच बता तँय, मानत हावस, काखर कहना।1।
चोरी करना काम हे, हवँव बहुत बदनाम।
सब के दिल चोरी करँव, एक इही बस काम।
एक इही बस, काम हवय जी, कहना मानव।
नैन लड़ाथौं, मया लुटाथौं, सच्ची जानव।
मोर नजर ले, बाँच सके नइ, कोनो छोरी।
कतको रखले, दिल सम्हाल के, करहूँ चोरी।2।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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