बाल कविता
दादा जी की छड़ी निराली, काम बहुत है आये।
दादी को शौतन सी लगती, पर दादा को भाये।
दादा जी का बना सहारा, सैर कराने जाते।
कुत्ता भौंके अगर राह में, उसको मार भगाते।
गइया को भी हाँक भगाते, बंदर को चमकाते।
अगर पेंड़ अमरूद मिला तो, झटपट मार गिराते।
नीम पेंड़ हो या बबूल की, दातुन तोड़ दिखाए।
सुबह-सुबह पूजा करने को, फूल तोड़ ले आए।
छड़ी बनू मैं दादा जी की, पल-पल साथ निभाऊँ।
जितना सम्भव हो मझसे वो, सारे कर दिखलाऊँ।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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