Saturday, 10 October 2020

लावणी छंद

लावणी छंद 

ये दुनिया के रंग मंच मा, अभिनय सब दिखलावत हे। 
कभू बनत हे बाप कभू ता, बेटा बन के आवत हे। 

कोनो बनके शेर दहाड़य, सिधवा ला डरव्हावत हे।   
जेला चाहत मारत हावय, कोनो बच नइ पावत हे।

कोनो बन चालाक लोमड़ी, अवसर अपन बनावत हे। 
कखरो राहय राज इहाँ पर, ओखर जेब भरावत हे। 

बन के ज्ञानी ज्ञान बाँट के, जाल अपन फइलावत हे। 
धरम करम के बात बता के, अपनो काम बनावत हे। 

फुलत फलत हे ठग के धंधा, लालच खूब दिखावत हे।  
झाँसा मा मनखे मन आके, पइसा अपन लुटावत हे।

बड़े-बड़े जादूगर बइठे, अचरज खेल दिखावत हे। 
भीख माँग के करे गुजारा, छाप नोट बतलावत हे। 

चोर उचक्का भरे परे हे, आधा रतिहा जे आवय।
हमर कमाये धन दौलत ला, चोरी कर के ले जावय।

कतको ढोंगी कुर्सी बइठे, पहन सरीफी के चोला। 
सब ले बड़का डाँकु हरे ये, बनके बइठे हे भोला।  

लड़य लड़ावय कतको मनखे, बम गोला बरसावत हे। 
रंग मंच मा लाय तहलका, सब मा दहसत लावत हे। 

बाँकी सब बरदी गरुवा के, जेती हाँकय जावत हे। 
जाँगर पेर कमावत हे पर, रूखा सूखा खावत हे। 

जइसे-जइसे पाठ सिरावय, परदा भीतर मा जावय। 
रूप बदल के अभिनय खातिर, रंग मंच मा फिर आवय।

देखत रहिथे सब के अभिनय, जे पटकथा बनाये हे। 
जब ज्यादा हालात बिगड़ जय, खुद अभिनय मा आये हे।

रचानाकार-दिलीप कुमार वर्मा  
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

 

 

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