Sunday, 18 October 2020

कुकुभ छंद

 दारू बंद 

कका सुने हँव बंद करत हे, दारू छत्तीसगढ़ मा गो। 
तही बता अब कइसे करबो,फँसबो जब झक्कड़ मा गो।

रदरद रदरद पानी गिरही,ओरवाती चुचवाही गो। 
मछरी कूकरी अउ बोकरा हर,बिन दारू का भाही गो। 

होरी के हुड़दंग सिराही , मजा कहाँ फिर आही गो। 
खोर गली सुन्ना हो जाही, होरी कोन मनाही गो।  

जब चुनाव के बारी आही, दारू कोन पियाही गो। 
बिना पियाये कोनो नेता,वोट कहाँ ले पाही गो। 

कोनो अइसन नइ नाचय गा, डीजे के बस बाजे ले। 
बिना पेग नइ होय परघनी,का होही बस साजे ले।

छट्ठी बरही के रौनक हा,दारू बिना अधूरा हे। 
सारा समधी तब आथे जब,दारू मुर्गा पूरा हे। 

अँगरेजी अउ देशी जाही, मउहा के दिन हर आही। 
रात रात भर गाँव गाँव मा,भट्ठी चढ़े सबो पाही। 

दरुहा मन के बात छोड़ तँय,ऊँखर मन के का होही। 
कभू कभू जे बइठय संगी,तेमन दुखड़ा ला रही। 

मानत हँव ऊँखर बर बढ़िया,जे दारू के आदी हे। 
धन दौलत ला फूंकय संगी,करथे जे बरबादी हे। 

पर अइसन ला रोक देय ले,उदिम हजारों ओ करथे। 
एक नशा ला नइ पावय ता ,दूसर ला ओ हर धरथे। 

आदी मनखे खोजत रहिथे,कोन डहर ले ओ पाही। 
चाहे कीमत दूना होवय,जइसे भी कर के लाही। 

पीने वाला पीयत रहिथे,बंद भला ये कब होथे। 
भीतर भीतर खेल ह चलाथे,फिर भी शासन हर सोथे। 

मानत हँव सच बात सबो पर,शासन के मजबूरी हे। 
सबझन ला खुशहाल रखे बर, दारू बंद जरूरी हे। 

सुनलव सबझन बात कहत हँव,दारू तनबर कीरा रे। 
घर कुरिया परिवार सिराथे, अब्बड़ होथे पीरा रे। 

बने करत हे बंद करत हे, अब मनखे मनखे होही। 
तन बर मन भर खाना होही,बिन चिंता मनखे सोही। 

लइका पाही अपन ददा ला,दाई लइका ला पाही। 
झुनिया ला जब मिले बुधारू,जुरमिल सब गाना गाही। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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