दिलीप कुमार वर्मा के सवैया
गंगोदक सवैया
दूर के ढोल हा नीक लागे सदा,तीर जे आय ता बेसुरा ताय जी।
जिंदगी मा तको रंग ऐसे दिखे,दूर रिस्ता रहे तेन हा भाय जी।
तीर जे आय ता रोज बाजा बजे,सोंचथे ये सगा आज ही जाय जी।
रंग ऐसे दिखाथे समे देख ले,छोड़ दाई ददा ला तको आय जी।
सुमुखी सवैया
कहाँ अब मान रहे जग मा,कुरसी बर होवत हे झगड़ा।
इहाँ सब खींचत हे पग ला,कुछ मोठ रहे कुछ हे रगड़ा।
बटे पइसा सब लोगन मा,नइ बाँट सके जिन हे ठगड़ा।
बने उन राज इहाँ करथे,जिन हे धनवान रहे तगड़ा।
मुक्ताहरा सवैया
समे समझावत हे सब ला,सब काम समे रहिते समटाव।
समे निकले कुछ हो न सके,फिर बाद म फोकट ना पछताव।
रहे जिन आलस मा फँस के,उन लोगन ला महता बतलाव।
समे कर मान करौ सब जी,पथ मा सब हा अघुवावत जाव।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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