Thursday, 1 October 2020

कुंडलियाँ


                   कका

कब ले बइठे हे कका, मुंडी अपन नवाय। 
काय कहे काकी हवय, सोंच कका पछताय। 
सोंच कका पछताय, करे का काम गलत हे। 
खींच तान हर आज, बिहिनिया साँझ चलत हे।
छोड़े जुआ शराब, आय काकी हे जब ले। 
चढ़े हवय का भांग, कका बइठे हे कब ले।  

कोरोना के दौर मा, कका हवय परसान। 
काम धाम सब बंद हे, आफत फँस गे जान। 
आफत फँस गे जान, कका के चिंता बाढ़े। 
कइसे होय जुगाड़, समस्या बड़का ठाढ़े। 
थोर बहुत मिल जाय, खोजथे कोना कोना। 
नइ पावत हे पार, कहे मर जा कोरोना।  

बन गे कका सियान जब, सरपंची मा जीत। 
भाग दौड़ अब खूब हे, बनगे कतको मीत। 
बनगे कतको मीत, पीयत हे दारू बइठे। 
बदले हावय चाल, कका मेंछा ला अइठे। 
भर गे बड़ अभिमान, घमंडी छाती तन गे। 
सीधा नइ हे बोल, कका जब मुखिया बनगे। 

भारी खरचा बाढ़ गे, गमन करे हर बार। 
सरपंची के जात ले, होगे बण्ठा धार। 
होगे बण्ठा धार, खानगी भारी मिल गे। 
पइसा सबो चुकात, खेत बारी तक पिल गे। 
होय कका कंगाल, बचे नइ लोटा थारी। 
भुगतत हे परिवार, समस्या होगे भारी। 

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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