बेटी
बेटी महिमा गावत हँव,तोला आज बतावत हँव।
ये धरती के गहना ये,दाई बाई बहना ये।
बेटी ला तुम झन मारव, आगी मा तो झन बारव।
बेटी जननी महतारी ,बेटी घर घर के नारी ।
बेटी घर के किलकारी ,दाई के ये सँगवारी।
भाई के प्यारी बहना,पापा के लाडो गहना।
बेटी देश चलावत हे, बेटी मान बढ़ावत हे।
बेटी सीमा मा ठाढ़े,बेटी ले दुनिया बाढ़े।
बेटी हे चूल्हा चौंका,बेटी ला दे दव मौंका।
ये जहाज उड़ावत हे, अधिकारी बन जावत हे।
बेटी अब नइ अबला हे, बनगे ओ तो सबला हे।
काँधा देख मिलाये हे, ओ मैदान म आये हे।
ममता के मूरत बेटी,दाई के सूरत बेटी।
पर भिड़ जाथे बैरी ले,मया लुटाथे पैरी ले।
बेटी ता खुशियाँ आथे,बाप तको हर इतराथे।
बेटी घर के शान हरे,पापा के अभिमान हरे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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