Friday, 9 October 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

बहरे रजज़ मुसद्दस मख़बून 
मुस्तफ़इलुन  मुफ़ाइलुन 

2212  1212   

सुख चाह हे अगर सदा। 
कुछ काम धाम कर सदा। 

घर के सियान सोंचथे। 
सब के भलाई बर सदा।  

माने सियानी गोठ ता।
सुमता रहत हे घर सदा। 

ज्यादा डले जे नून हा। 
कर देत हावे खर सदा। 

भुतहा फिलीम देख झन।
रतिहा म लागे डर सदा।   

पाथे कुकुर ह खाय बर। 
देये रथे ओ गर सदा। 

आके "दिलीप" बइठ ले। 
पावन हे प्रभु के दर सदा।  

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

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