Sunday, 18 October 2020

सार छंद

माटी के घर

रहिस बने माटी के कुरिया,जाड़ लगे ना गरमी। 
खपरा ऊपर रहे छवाये,निशदिन लागे नरमी। 

कुरिया ऊपर रहे पठउँहा,जे घर ला दँदकावय। 
जाड़ा मा गरमी ओ लावय,गरमी तक मा भावय। 

अँगना परछी बरवट जम्मो, खुल्ला-खुल्ला राहय। 
हवा घाम छन-छन के आवय, मन उड़ियावन चाहय।

अँगना मा दरमी के बिरवा, अउ तुलसी के चौरा। 
गौरैया दिनभर नरियावय,लइका खेलय भौरा। 

रतिहा कन चंदा घर आवय, अँगना ला उजरावय। 
लाख चँदैनी आसमान ले, अपन हँसी बगरावय। 

खटिया अँगना बीच जठाये, खुसी खुसी सुत जावन। 
होत बिहानी चिंव चिंव सुन के,अँगना लागे पावन। 

बरसा के दिन देख घटा ला, मन अबड़े हरसावय। 
रदरद रदरद बरखा रानी, सीधा अँगना आवय। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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