मुहावरा सार
जिसकी लाठी भैंस उसी की,खेंच जहाँ ले जाये।
बिन लाठी का रहे ताकते,करता हाये हाये।
ढम्मक ढम्मक दूर बजे तो,लगता ढोल सुहाना।
करकस लगता कान फ़टे सा,मत नज़दीक बजाना।
काला अक्षर भैंस बराबर,क्यों लगता है भाई।
अनपढ़ को भी पढ़ा लिखा दो,ना हो अब करलाई।
खाक छानना पड़ सकता है, इतनी है आबादी।
मिला नही यदि काम कहीं तो, होगी फिर बर्बादी।
खून पसीना एक करो तब, मिलता दाना पानी।
आलस ले डूबेगा तुझको, मत कर तू नादानी।
खून खौलना तो वीरों की, होती एक निसानी।
जो दुश्मन से डर जाए तो, खून नही है पानी।
वही खून का प्यासा होगा, जो धोखा है खाया।
मगर जोश में होश गँवाया, जीवन भर पछताया।
सभी काम पूरा होता है, अगर विघ्न ना आये।
काम खटाई में पड़ता है, कोई जब ठुकराये।
गाल बजाना छोड़ो साथी, काम करो कुछ मन से।
वरना उसदिन पछताओ गे, हाथ धुले जब धन से।
गढ़ा खोदना महँगा पड़ता, खुद ही जब गिर जाते।
हानि देख अपने खाते में, जीवन भर पछताते।
गोबर गणेश ही कहते हैं, मुझको आज जमाना।
पता नहीं क्यों बात बात में, देते मुझको ताना।
गोली मार नही जो आते, हमको तो है जाना।
सत्य मार्ग पर कदम बढ़ा के, अब काहे पछताना।
छोटी छोटी बातों पर यूँ, गाल फुलाना छोड़ो।
मंजिल तुझको बुला रही है, उस पग में मुख मोड़ो।
गला फाड़ना उचित नही है, धीर धरो कुछ प्यारे।
धीर धरे तो खीर मिलेगा, फिर हो वारे न्यारे।
गधा बनाना उचित नही है, यूँ अप्रैल महीने।
अच्छे कर्मों की बेला है, पुण्य प्रसादी पीने
छोड़ गधे को बाप बनाना, मन विश्वास जगा ले।
काम सुफल सब हो जाएँगे, राह सहीं अपनाले।
खोटा सिक्का समझ कभी भी, फेंक कहीं मत देना।
बुरे वक्त में काम पड़े तो, काम इसी से लेना।
खून सूख जाता है मेरा, बाप खड़ा जब आगे।
सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती, दिल की धड़कन भागे।
जब गर्दन पर छुरी चलाना, काम तुझे ना भाये।
फिर अपनो में काहे तूने, अबतक छुरी चलाये।
गागर में सागर भरना है, काम बड़ा कर जाओ।
एक वाक्य जो कह दे पूरा, शब्द ढूंढ ओ लाओ।
गुस्सा पीना बड़ा काम है, अनहोनी को रोके।
पर अंतर में बैर बढाना, सारा जीवन झोंके।
जब गुड़ गोबर करना ही था, साथ यहाँ क्यों आये।
बना बनाया खेल बिगाड़े, वो मुझको ना भाये।
काम काज में गच्चा खाना, उचित नही है प्यारे।
एक बार मिलता है मौका, ध्यान हटा ओ हारे।
गीदड़ भभकी देने वालों, खुद को जरा निहारो।
सोया है जब शेर कहीं तो, पैर पूँछ मत मारो।
खुले घाव में नमक छिड़कना, बहुतों को है आता।
खुद पे विपदा आन पड़ी तो, नैना फिरे छुपाता।
घाट घाट का पानी पीकर, हमने ये जाना है।
दगा बाज दुनिया वालों से, भिड़ना है माना है।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़
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