Thursday, 1 October 2020

गजल

गजल- दिलीप कुमार वर्मा 

212 212 212 2 

टूटहा छानही ले टपक थे। 
रात भर रोज दाई छपक थे। 

रोज रसता मिले एक टूरा। 
देख मोला ओ आँखी झपक थे। 

छूट जाथे दुपट्टा कभू ता। 
राह मा मनचला मन लपक थे।  

मोर बेटा हवय संस्कारी। 
पाँव रतिहा के मोरो चपक थे।  

रो रहिथे कहूँ रात लइका। 
सुत जा कहिके ग दाई थपक थे।  

रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़


No comments:

Post a Comment