Sunday, 18 October 2020

गीत


सरग के रसता खुलगे आज, सरग के रसता खुलगे आज। 
अर्थ ब्यवस्था जे बिगड़े गे, इही बनाही काज। 

माँगत माँगत शासन थक गे, करय न कोनो दान। 
खाली होगे हवय खजाना, कइसे बाँचय जान। 
सरकारी कोठी के भाई, इही बचाही लाज। 

दस रुपिया का सौ बड़हा दे, तभो बेचावय पोठ। 
लाइन बिहना ले लग जाही, होय कमाई रोठ।  
मार करोना दिखलावव फिर, बन जावव सरताज।

मानत हँव खुलना नइ चाही, पर का हवय उपाय।
बिन पइसा के लड़ नइ पाही, हार तको हो जाय।
खुले रहे ले भरे खजाना, जाने का हे राज। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा

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