सखी छंद
शहर के रोना
जब ले शहर बनाये हे।देख सबो हरसाये हे।
छोड़ सबो आवत हावै।गाँव कहाँ भावत हावै।
बड़का महल अटारी हे।काम सबो सरकारी हे।
नाली सड़क बने पाबे।जेन गली तँय हर जाबे।
बिजली हे जतका चाही।पानी तक ला ओ लाही।
गली गली बहराथे जी। कचरा लेगे आथे जी।
जे चाही ते मिल जाथे।गली गली बेचे आथे।
खुले दुकान हवय भारी।लेवत हे सब नर नारी।
पर मनखे घर खुसरा हे।सच मानव खसभुसरा हे।
बाहिर कोती नइ जावै।बइठे घर बड़ दुख पावै।
भइसा कस तन होगे जी।बइठे के फल भोगे जी।
बीमारी सचरे हावै।खाये के सुख नइ पावै।
शोर शराबा हे भारी।जीना अब हे लाचारी।
इहाँ प्रदूषण बाढ़े हे।काल दुवारी ठाढ़े हे।
रोग हृदय ला हो जाथे।तभ्भे तो झटका आथे।
शक्कर के बीमारी हे।पर जीना लाचारी हे।
केंसर रोग हमाथे जी।जे हर तन ला खाथे जी।
आनी बानी के रोगी।जादा मन शहरी भोगी।
झुग्गी मन के डेरा हे।दलदल सदा सवेरा हे।
पनपत हवय महामारी।मरना हवय सदा जारी।
अपराधी मन के डेरा।रोज लगावत हे फेरा।
जाने कब का हो जाही।सोंचय कइसे ओ आही।
चोर उचक्का तक आथे।लूट सबो ला ले जाथे।
छीनत हे चाँदी सोना।इही शहर के हे रोना।
रचानाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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