Monday, 24 June 2019

मनहरण घनाक्षरी

छत्तीसगढ़िया व्यंजन

बरा या सोंहारी खाले,ठेठरी ल तें पचाले,
खुरमी ल खाले संगी,गाबे गुन गान जी।
चीला की खपुर्रा खाबे, पतला तवा के पाबे,
अंगाकर खाले संगी,चटनी म सान जी।
फरा मुठिया ला खाले,बोबरा बने बनाले ,
गुझिया बनाये हवे, झट देवों लान जी।
छत्तीसगढ़िया रोटी,तनिक न रहे खोटी,
मन भर खाबे बाबू,जाबे पहिचान जी।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

हाकली छंद

अत्याचार

कहाँ हवस भगवान बता।लइका मन ला झन ग सता।
होवत अत्याचार इहाँ।मानत हे भगवान जिहाँ।

रकसा घर घर बाढ़त हे।दुख देये बर ठाढ़त हे।
अइसन मन के नास करौ।मारे खातिर बाण धरौ।

नारी निर्बल मानत हे।अबला ओला जानत हे।
बल से अत्याचार करे। मन माफिक हथियार धरे।

उम्र तको नइ देखत हे।रद्दा बाट म छेंकत हे।
बड़का धर ले जावत हे।लइका कहाँ बचावत हे।

बिनती ला नइ मानत हे।धरे कटार ल तानत हे।
कोनो ला डर्राय नहीं। मारत तक थर्राय नहीं।

अब्बड़ सोर मचावत हे।हिरदे ला दहलावत हे।
काखर बल मा गरजत हे।नइ मानय जे बरजत हे।

मनखे मन सब हार चुके।मन अपनो सब मार चुके।
अब तो तोरे आस हवै।आबे ये बिसवास हवै।

तीर कमान धरे झन आ।चक्र सुदर्शन झन दिखला।
तिरसुल काम न आवत हे।गदा कहाँ चलपावत हे।

किसिम किसिम हथियार धरे।ये बैरी मन काम करे।
येखर काट निकालव ना।नवा नवा कुछ लानव ना।

मारव जइसे भी करके।काँपय जम्मो मन डर के।
अइसन कुछ तो काम करौ।जन जन मन के पीर हरौ।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

हाकली छंद

गूगल

गूगल ज्ञानी ज्ञान कहे।मोर कहे ला मान कहे।
जइसे मँय बतलावत हौं।अच्छा से समझावत हौं।

पूछ्व बात फटाफट जी।पाव जवाब खटाखट जी।
जइसन चाहव पूछ सकौ।मोर जवाब सवाद चखौ।

धरती ले अम्बर तक जा।या सागर के पूछ सखा।
जम्मो ज्ञान धराय हवे।गूगल ज्ञानी पाय हवे।

का पकवान बने कइसे।नानी हर जानय जइसे।
सब येमा भंडार भरे।पूछ सबोझन काम करे।

खेती कइसे हे करना।कतका हे पानी भरना।
खातू देना हे कतका।जहर होय झन नइ जतका।

ये इतिहास बतावत हे।मुर्दा तक घर लावत हे।
कोन मरे कइसे कहिथे।मनखे मन कइसे रहिथे। 

गाना सुनले तँय झट ले।फ़िल्म दिखाथे ये खट ले।
पुस्तक जेला भी पढ़ले।जिनगी जइसे भी गढले।

आये हे भगवान कहाँ।काम करे का जहाँ तहाँ।
का खातिर बर आवत हे।कइसे काम बनावत हे।

जीव जगत ला जानत हे।कहाँ रहे ये छानत हे।
तन कइसे सब काम करे।अलग अलग सब नाम धरे।

बीमारी होथे कइसे।बैद बतावत हे जइसे।
करना का उपचार कहे।जम्मो गूगल ज्ञान रहे।

जब कोनो घर जावत हे।रसता तको बतावत हे।
कोनो कहूँ गँवावत हे।खोज उहू दिखलावत हे।

छोटे ले छोटे तक हे।पूछ्व जतका जी सक हे।
ज्ञान पिटारा खोलव जी।बात अपन बस बोलव जी।

कतका बता बखान करौं।मँय अज्ञानी अभी हरौं।
पूरा खोल न पाय हवौं।कुछ कुछ ला बतलाय हवौं।

सबके साथी बने हवै।गूगल मा जे सने हवै।
पता चले ना समे कहाँ।गूगल हे जब साथ जहाँ।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सरसी छंद

  झिल्ली (प्लास्टिक बैग)

झिल्ली के बिन काम चले ना,बेबस है इंसान।
पर झिल्ली होता है भाई,बहुत बड़ा शैतान।

छोटी सी छोटी चीजें अब,झिल्ली भर बेंचाय।
बड़े बड़े झिल्ली में भर के,धर सब घर ले आय।

पाउच या मिक्चर हो कोई,शेम्पू बिस्किट मान।
हल्दी मिर्च नमक या धनिया,पोहा तेल पिसान।

कपड़ा पानी बर्तन झाड़ू,खेल खिलौने दाल।
झिल्ली में सब भर कर आते,बन जाते जंजाल।

डिस्पोजल भी पाट रहा है,हराभरा मैदान।
मच्छर का घर बन जाता है,दुख पाये इंसान।

नाली में झिल्ली है जाता, बंद करे सब द्वार।
खेत खार चौपट हो जाता,खेती हो बेकार। 

पर कुछ काम रहे झिल्ली का,जो सबको स्वीकार।
पानी से बचने के खातिर,लोग लगाते द्वार।

छान्ही के ऊपर छाने को,ढँकते और अनाज।
पानी से गर बचना है तो,झिल्ली है सरताज।

जहाँ जरूरी लगता है बस,वहीं करें उपयोग।
वरना झिल्ली से बढ़ सकता,भारी भरकम रोग।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

योग

16/13 योग

योग करे बर सोंचत हावँव।पाछू तेरा साल ले।
आज तको मँय काहत हावँव।सुरु कर देहूँ काल ले।

पाँच बजे उठ नहा धोय के,महूँ लगाहूँ ध्यान जी।
हाथ गोड़ ला हिला डुला के,करँव योग सच मान जी।

आसन मा बइठे बइठे मँय,भर के लम्बा सांस ला।
छोड़त रइहूँ धीरे धीरे,नइ छोड़व मँय आस ला।

मँय अनुलोम विलोम ल करहूँ ,ध्यान सांस मा लाय के।
अउ कपाल भारती ल करहूँ,,बड़का पेट घटाय के।

ताड़ासन तन लम्बा करहूँ,भ्रमर सुनाहूँ कान ला।
सुरुज नमन कर स्वस्थ रहँव मँय,अपन बचाहूँ जान ला। 

रोज बिहानी सोंचत रहिथौं,कब आही ये काल जी।
रसता जोहत जोहत लगथे,यहू निकलही साल जी।

रसता देखत काल आय के,झन आ जावय काल जी।
तेकर सेती आज करत हँव,टोरे बर जंजाल जी।

झन देखव काली के रसता,आज करव सब योग जी।
स्वस्थ रहे तन मगन रहे मन,सबझन रहव निरोग जी।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

दोहा

दोहा

मरनाशन में लेट कर,देख जगत का हाल।
कौन यहाँ अपना रहे,कौन चाहता काल।

बहुत दुखी तेरे लिए,करता रहे विलाप।
अंतस पट को झाँकिए, कितना मन मे ताप।

जिंदा रहने से अगर,मिलता है कुछ दाम।
ओ ज्यादा दुख में रहे,जिससे तुझको काम।

कर्जदार गर हो सखा,लेके साहूकार।
दुआ करे ओ रात दिन,आता रहे उधार।

पत्नी का लफड़ा रहे,सोचे ये मरजाय।
दूजा करूँ विवाह जो,काम बहुत ओ आय।

बेटा चाहे बाप का,अनुकम्पा मिलजाय।
बिन मिहनत की नौकरी,कामचोर को भाय।

बीमा का पैसा मिले,पूर्ण ख्वाब हो चंद। 
पत्नी चाहे काल क्यों,आज स्वांस हो बंद।

बाप हमेसा चाहता,ठीक रहे औलाद।
फले फुले घर आँगना,जाए मेरे बाद।

बेटी रोती रह गई,एक रखे अरमान।
सर से साया ना हटे,रहे सलामत जान।

बिलख बिलख माँ रो रही, हाथ रखे ओ भाल।
बेटा के बदले अभी,मुझको आये काल।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

ताटक छंद

हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कर ना पाता है।
जलता है अंदर हीं अंदर,कहने से घबराता है। 

टूटी फूटी सड़क देख कर,आग बबूला होता है।
सड़क किनारे पेंड़ कटे तो,अंतस मनवा रोता है।
देख गंदगी आसपास में,भीतर से जल जाता है।
हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कर ना पाता है।

बेजा कब्जा किए हजारों,कोई रोक नहीं पाता।
चारागाह नजर ना आए,भारी संकट गहराता।
शहर नगर बस गई झुग्गियाँ, उसको कौन हटाता है।
हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कर ना पाता है।

बिना घूस के काम चले ना,यही ब्यवस्था जारी है।
मध्यम वर्ग सदा से पिसता, ये तकदीर हमारी है।
मौन रहे सब झेल रहे हैं,
हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कह ना पाता है।

अपनी गलती कभी दिखे ना,कलयुग के इंसानों को।
पैसा दे या लड़ के जग से,पूर्ण करे अरमानो को।
उठा दूसरों पर ओ ऊँगली, अपना काम चलाता है।
हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कर ना पाता है।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

Monday, 10 June 2019

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ गरमी के

बघवा आये खोर मा,बाहिर झन तँय झाँक। 
हबके बर आगू खड़े,तुरत चबाही नाक।
तुरत चबाही नाक,कान तक नइ तो बाँचय।
पाँव रखे जे खोर,बराती जइसे नाचय।
तुरते रहे भुंजाय, बने जे बाहिर अघवा।
बढ़े सुरुज के ताप,लगे जस आये बघवा।1।

जब ले गरमी आय हे, बाढ़े हवय अँजोर।
काल बरोबर लागथे,सुन्ना होगे खोर।
सुन्ना होगे खोर,मिले न मरे रोवइया।
पहुँना मरजय प्यास,दिखे नइ कोनो भइया।
ए सी कूलर संग, पाय हे सब्बो नरमी।
घरखुसरा कहलाय, बढ़े हे जब ले गरमी।2।

सुख्खा तरिया देख के,गरवा रहे उदास।
गला सुखागे प्यास मा ,अब बरसा के आस।
अब बरसा के आस,नही ते सब मरजाबो।
जावन कती बताव,जिहाँ हम पानी पाबो।
नदिया नरवा झील,लगे सब सुख्खा परिया।
बाँचय कइसे जान,रहे जब सुख्खा तरिया।3।

आये ले विज्ञान के,काम होय हे खास।
बिन मिहनत के होय ले,बाढ़िस हवय विनास।
बाढ़िस हवय विनास,काम आसानी होगे।
कटगे जम्मो पेंड़,मनुज करनी ला भोगे।
पानी सबो निकाल,बहा दिन बोर कराये।
धरती सुख्खा होय,मसनरी जब ले आये।4।

रोबे झन मनखे कभू,बस करनी ला भोग।
तोरे कारण ही मिले, आनी बानी रोग।
आनी बानी रोग,सचरगे हावय तन मा।
कखरो नइ हे दोष, मनुज के हावय मन मा।
जतके जाबे दूर,सबो तँय सुख ला खोबे।
परियावरण बचाव,नही ते अबड़े रोबे।5।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ

छत छतरी छतराय हे, देवत हावय छाँव।
ददा बने छतरी रहे,जरय कभू नइ पाँव।
जरय कभू नइ पाँव,रहे ओ सुख के सागर।
कतको तँय हर मांग,देत ओ आगर आगर।
खाली रहे न पेट,मिलय भर पतरी पतरी।
जिनगी भर सुख झेल,ददा के हे छत छतरी।

ममता मइ माता रहे,मया लुटावय रोज।
माँ जइसन कोनो नही,कतको ले तँय खोज।
कतको ले तँय खोज,सरग मा तक नइ पाबे।
माँ होथे अनमोल,पूछ ले जेती जाबे।
मौसी नानी जेन,रहय नइ काँही समता।
सागर कस भरपूर,मया मइ माई ममता।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ

नकटा कुटहा मन सबो, बारी बारी आय।
हमला उल्लू जान के,काँव काँव चिल्लाय।
काँव काँव चिल्लाय,झूठ बोलत हे भारी।
समे परे तब आय,बतावय बड़ लाचारी।
सरम घलो नइ आय,रहे ये भारी जुठहा।
अवसर वादी जान ,रहे ये नकटा कुटहा।

कतको तँय दुतकार ले,नइ जावय ये दूर।
पाँव धरे बिनती करे,कर देथे मजबूर।
कर देथे मजबूर,हमर ले वादा लेथे।
कुटहा येला जान,कुकुर कस गर ला देथे।
ये नइ कभू अघाय,खाय बर दे तँय जतको।
सागर रहिथे पेट,भरे मिलजाही कतको।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ

पानी तरिया मा रहे,रहे खेत खलिहान।
नदिया नरवा ढोड़गी,झिरिया कुआँ खदान।
झिरिया कुआँ खदान,सबो मा पानी पाते।
जन जीवन खुशहाल,धरे पग जेती जाते।
तइहा के ये बात,बताथे हमला नानी।
अब तो हाहाकार,मिले ना चुरुवा पानी।

कइसे होही सोंचथौं, ये जग के कल्याण।
मनखे, मनखे ले लड़े,रोज चलावय बाण।
रोज चलावय बाण, मारथे अपने भाई।
लहू बहे हर रोज,मचे घर घर करलाई। 
करदव कछू उपाय,रहय सब मनखे जइसे।
हो जावय कल्याण,सोंचथौं होही कइसे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ

शिक्षा देते हैं सभी,पर लेता ना कोय।
बैठे हैं अभिमान में,बाद रहे सब रोय।
बाद रहे सब रोय, समय चलता जो आगे।
पाने को फिर ज्ञान,वही सब दरदर भागे।
गए समय जो चूक,कौन अब देगा दीक्षा।
समय रहे अनमोल,मिले तो लेलो शिक्षा। 

बच्चा या बूढा रहे,ज्ञान मिले अनमोल।
ज्ञानी को ना आंकिये,उम्र तराजू तोल।
उम्र तराजू तोल, पता ना कुछ पाओगे।
बूढा देगा ज्ञान,समझ गर तुम जाओगे।
कहना अब तो मान,ज्ञान होता है सच्चा।
जाके ज्ञान बटोर,बड़ा ज्ञानी है बच्चा।

आकर्षित होते सभी,रूप रंग को देख।
लक्ष्मी जब घर आय तो,गुण को जरा सरेख।
गुण को जरा सरेख,काम इनसे है बनता।
गर होगा कुछ दोष,तभी आँखे है तनता।
रूप रंग को देख,कभी ना होना हर्षित।
गर लक्ष्मी गुणवान,सभी होंगे आकर्षित।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ

माते हाहाकार हे, गरमी हे बिकराल।
सुरुज देव कइसे कहँव,तहीं बिगाड़े हाल।
तहीं बिगाड़े हाल,तपा दे धरती दाई।
सुख्खा नदिया ताल,मचा दे हच करलाई।
पूजा होतिस तोर,दिसम्बर मा जे आते।
अभी हवस जंजाल,घरों घर झगरा माते।1।

ऊर्जा के तँय स्रोत अस,मानत हे संसार।
अतका ऊर्जा फेंक के,धरती ला झन बार।
धरती ला झन बार,जीव सब्बो मरजाही।
पानी जाही सूख, पेड़ मन सब जर जाही।
मनखे का बचपाय,टूटही पुर्जा पुर्जा।
रख ले बने सम्हाल,काम आही सब ऊर्जा।2।

बाढ़े गरमी देख के,मन मा आय विचार।
कुछ कम हे ता चल जही,जादा हे बेकार।
जादा हे बेकार,रहे सरदी या गरमी।
पानी लाथे बाढ़,पाय नइ कोनो नरमी।
हवा बनय तूफान,उखाड़य रुखुवा ठाढ़े।
धन लाथे अभिमान,जेन घर जादा बाढ़े।3।

बिन गरमी के मर जही,जतका रहे सजीव।
गरमी जादा होय ता,बरही जस निरजीव।
बरही जस निरजीव,बात कुछ समझ न आवय।
कइसे करँव उपाय,सबो जिनगी बच जावय।
पेंड़ लगे जे पोठ,सबोझन पाही नरमी।
ऊर्जा तक मिलजाय,पाय सुख सब बिन गरमी।4।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

दोहा

दोहा

सबो फेसबुक फ्रेंड ला,करत हवँव जोहार।
भेजत हावँव नेवता,आहू नदिया पार।

करना हावय पारटी,मिल जाबो सब संग।
आनी बानी भोज के,सबो जमाबो रंग।

एक मंच सब ला मिले,हो बढ़िया संवाद।
मेल जोल होवय बने,खाना सबले बाद। 

का का खाना हे बता,मीनू लेवव खोज।
नानवेज की वेज जी,कइसन होही भोज। 

पालक संग पनीर की,खाबो बकरा भात।
पूड़ी खीर बनाँव की,बिरियानी के बात।

मदिरा चाहत हव कहूँ, लेबल बने बताव।
कतका कतका माँग हे, लिस्ट तुरत भिजवाव। 

चखना मा काला रखन,सोच बने बतलाव।
चिंगरी भुंजवा चल जही,या काजू के चाव।

कोन कोन आहू बता,कब होही ये काम।
कोन नदी के तीर मा, कब देबो अंजाम।

सबो फ्रेंड आही तभे,हो पाही ये काम।
नइ आही जे मन इहाँ,ओमन देही दाम। 

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

दोहा


दोहा

दोहे

गौर वर्ण की सुंदरी,जिसके काले नैन।
मेघ सरीखे जुल्फ हैं,कोयल जैसी बैन।

चंदा जैसी छब लिए,मुख मीठी मस्कान।
रंग गुलाबी होठ है,ज्यूँ खाई हो पान।

भौंहे तीर कमान सा,कजरा लगे कटार।
गाल गुलाबी फूल है,होठ लगे रसदार। 

ना ऊँची तूँ ऊंट सी,जिसके लम्बे पाँव।
छोटी पर ठिगनी नही,ज्यों बरगद के छाँव।

काया हाथी सा नही,जिसके देंह विसाल।
जिस तन पे गिर जाय तो,बन जाये ओ काल। 

तूँ पूरी परफेक्ट है,ज्यूँ घोड़ी के देंह।
देख तुझे क्यों साँवरी,अंतस उठे स्नेह।

अब तेरी बस चाह है,मृग नैनी सुन बैन।
जो मेरी तूँ ना हुई,नहीं मिलेंगे चैन।

मेरे घर में आ सखी,कर दे मुझे निहाल।
रौशन कर घर आँगना, मेंट सभी जंजाल।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

चौपाई

दोहा
सुरुज देव घर आय ता, सुख सूखा हो जाय।
जान बँचा के भागथे, सबझन मुड़ी लुकाय।1।

चौपाई

गरमी हर बड़ बाढ़त हावय।छइहाँ ला कोनो नइ पावय। 
पेंड़ काट सुन्ना कर डारे।मछरी कस अब तड़फे प्यारे।

लकलक लकलक धरती करथे।पाँव रखे मा चटचट जरथे। 
बिन गमछा जे बाहिर जावय। सुकसी मछरी कस भूंजावय।

धरे गोंदली बाहिर जाबे।तभ्भे लू ले तँय बँच पाबे।
गन्ना सरबत आमा पाना।गरमी मा सब पीना खाना।

नदिया नरवा सब सूखा गे।देखत देखत जेठ सिरागे।
जाने कब बरसा हर आही।सूखे मन के प्यास बुताही। 

आस लगाये ताकत रहिथौं।धीर धरव मँय सब ला कहिथौं।
ऊपर वाला देर करत हे।पर नइ ओ अंधेर करत हे।

आज नही ता काली आही।सब के घर मा खुशियाँ छाही।
धरती दाई हर हरसाही।जब बादर पानी बरसाही।

आस रखव मन मा सबो,आही जी बरसात।
अइसन लकलक धूप के,छटही करिया रात।2।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार

चौपाई

चौपाई छंद  गाँव

महिमा गाथे गाँव के,बसे शहर मा आय।
अइसन जुच्छा बात ला,कोन भला अपनाय।1।

सब रचना मा करय बड़ाई।गाँव सबो ले बढ़िया भाई।
गाँव डहर कोनो नइ जावय।सबो शहर कोती रतियावय।

नदिया नरवा के गुण गावय।पर चिखला कोनो नइ भावय।
माटी घर के करे बड़ाई।पर जम्मो पक्की अपनाई।

खेत खार तरिया ला गावय।पर बिच्छी ले बड़ घबरावय।
बर पीपर के छाँव बताथे।एक पेंड़ पर कोन लगाथे।

कंडिल के सब गाथा गाही।छितका कुरिया ला सहराही।
पर बिजली के देखे भागय।बिन बिजली रतिहा जे जागय।

गउ माता कागज मा मानय।गइया ला कोनो नइ जानय।
आज गाँव ले गाय भगा गे।घूमत हे लावारिस लागय।

खेती के महिमा सब गाथे।हरियर धान देख सहराथे।
पर कोनो करना नइ चाहय।गाँव छोंड़ शहरी बन राहय।

चिक्कन घर के आदी होगे।कोन भला चिखला ला भोगे।
खोर गली कंक्रीट लगे हे।साँप बिछी सब दूर भगे हे।

महू इही लाठी के मारे।गाँव छोंड़ के शहर पधारे।
पर सुरता बचपन के हावय।सोंच सोंच अंतस सुख पावय।

अब जाँगर कोनो नइ पेरह।भरे कुंड के पानी हेरय।
जाने कब तक ओ चल पाही।सबो घूम फिर वापिस आही।

गाँव निहारत हावय रसता।आही बाबू धर के बसता।
धरती के सब खान सिराही।खेत काम फिर सब के आही।

जेकर होवत हे उत्पादन।तेन काम मा हाथ बटावन।
धरती दाई ला सिरजावन।खान बंद कर पेंड़ लगावन।

खाये के सब चीज हा, खेत खार ले आय।
धरती भीतर जे मिले, कोन भला ओ खाय।2।

सुविधा दे दव गाँव मा, बिजली के भरपूर।
गाँव सरग बन जाय जी,छोंड़ न जावय दूर।3।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार