कुंडलियाँ गरमी के
बघवा आये खोर मा,बाहिर झन तँय झाँक।
हबके बर आगू खड़े,तुरत चबाही नाक।
तुरत चबाही नाक,कान तक नइ तो बाँचय।
पाँव रखे जे खोर,बराती जइसे नाचय।
तुरते रहे भुंजाय, बने जे बाहिर अघवा।
बढ़े सुरुज के ताप,लगे जस आये बघवा।1।
जब ले गरमी आय हे, बाढ़े हवय अँजोर।
काल बरोबर लागथे,सुन्ना होगे खोर।
सुन्ना होगे खोर,मिले न मरे रोवइया।
पहुँना मरजय प्यास,दिखे नइ कोनो भइया।
ए सी कूलर संग, पाय हे सब्बो नरमी।
घरखुसरा कहलाय, बढ़े हे जब ले गरमी।2।
सुख्खा तरिया देख के,गरवा रहे उदास।
गला सुखागे प्यास मा ,अब बरसा के आस।
अब बरसा के आस,नही ते सब मरजाबो।
जावन कती बताव,जिहाँ हम पानी पाबो।
नदिया नरवा झील,लगे सब सुख्खा परिया।
बाँचय कइसे जान,रहे जब सुख्खा तरिया।3।
आये ले विज्ञान के,काम होय हे खास।
बिन मिहनत के होय ले,बाढ़िस हवय विनास।
बाढ़िस हवय विनास,काम आसानी होगे।
कटगे जम्मो पेंड़,मनुज करनी ला भोगे।
पानी सबो निकाल,बहा दिन बोर कराये।
धरती सुख्खा होय,मसनरी जब ले आये।4।
रोबे झन मनखे कभू,बस करनी ला भोग।
तोरे कारण ही मिले, आनी बानी रोग।
आनी बानी रोग,सचरगे हावय तन मा।
कखरो नइ हे दोष, मनुज के हावय मन मा।
जतके जाबे दूर,सबो तँय सुख ला खोबे।
परियावरण बचाव,नही ते अबड़े रोबे।5।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
बघवा आये खोर मा,बाहिर झन तँय झाँक।
हबके बर आगू खड़े,तुरत चबाही नाक।
तुरत चबाही नाक,कान तक नइ तो बाँचय।
पाँव रखे जे खोर,बराती जइसे नाचय।
तुरते रहे भुंजाय, बने जे बाहिर अघवा।
बढ़े सुरुज के ताप,लगे जस आये बघवा।1।
जब ले गरमी आय हे, बाढ़े हवय अँजोर।
काल बरोबर लागथे,सुन्ना होगे खोर।
सुन्ना होगे खोर,मिले न मरे रोवइया।
पहुँना मरजय प्यास,दिखे नइ कोनो भइया।
ए सी कूलर संग, पाय हे सब्बो नरमी।
घरखुसरा कहलाय, बढ़े हे जब ले गरमी।2।
सुख्खा तरिया देख के,गरवा रहे उदास।
गला सुखागे प्यास मा ,अब बरसा के आस।
अब बरसा के आस,नही ते सब मरजाबो।
जावन कती बताव,जिहाँ हम पानी पाबो।
नदिया नरवा झील,लगे सब सुख्खा परिया।
बाँचय कइसे जान,रहे जब सुख्खा तरिया।3।
आये ले विज्ञान के,काम होय हे खास।
बिन मिहनत के होय ले,बाढ़िस हवय विनास।
बाढ़िस हवय विनास,काम आसानी होगे।
कटगे जम्मो पेंड़,मनुज करनी ला भोगे।
पानी सबो निकाल,बहा दिन बोर कराये।
धरती सुख्खा होय,मसनरी जब ले आये।4।
रोबे झन मनखे कभू,बस करनी ला भोग।
तोरे कारण ही मिले, आनी बानी रोग।
आनी बानी रोग,सचरगे हावय तन मा।
कखरो नइ हे दोष, मनुज के हावय मन मा।
जतके जाबे दूर,सबो तँय सुख ला खोबे।
परियावरण बचाव,नही ते अबड़े रोबे।5।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
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