Monday, 10 June 2019

कुंडलियाँ

कुंडलियाँ

पानी तरिया मा रहे,रहे खेत खलिहान।
नदिया नरवा ढोड़गी,झिरिया कुआँ खदान।
झिरिया कुआँ खदान,सबो मा पानी पाते।
जन जीवन खुशहाल,धरे पग जेती जाते।
तइहा के ये बात,बताथे हमला नानी।
अब तो हाहाकार,मिले ना चुरुवा पानी।

कइसे होही सोंचथौं, ये जग के कल्याण।
मनखे, मनखे ले लड़े,रोज चलावय बाण।
रोज चलावय बाण, मारथे अपने भाई।
लहू बहे हर रोज,मचे घर घर करलाई। 
करदव कछू उपाय,रहय सब मनखे जइसे।
हो जावय कल्याण,सोंचथौं होही कइसे।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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