दोहा
सुरुज देव घर आय ता, सुख सूखा हो जाय।
जान बँचा के भागथे, सबझन मुड़ी लुकाय।1।
चौपाई
गरमी हर बड़ बाढ़त हावय।छइहाँ ला कोनो नइ पावय।
पेंड़ काट सुन्ना कर डारे।मछरी कस अब तड़फे प्यारे।
लकलक लकलक धरती करथे।पाँव रखे मा चटचट जरथे।
बिन गमछा जे बाहिर जावय। सुकसी मछरी कस भूंजावय।
धरे गोंदली बाहिर जाबे।तभ्भे लू ले तँय बँच पाबे।
गन्ना सरबत आमा पाना।गरमी मा सब पीना खाना।
नदिया नरवा सब सूखा गे।देखत देखत जेठ सिरागे।
जाने कब बरसा हर आही।सूखे मन के प्यास बुताही।
आस लगाये ताकत रहिथौं।धीर धरव मँय सब ला कहिथौं।
ऊपर वाला देर करत हे।पर नइ ओ अंधेर करत हे।
आज नही ता काली आही।सब के घर मा खुशियाँ छाही।
धरती दाई हर हरसाही।जब बादर पानी बरसाही।
आस रखव मन मा सबो,आही जी बरसात।
अइसन लकलक धूप के,छटही करिया रात।2।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
सुरुज देव घर आय ता, सुख सूखा हो जाय।
जान बँचा के भागथे, सबझन मुड़ी लुकाय।1।
चौपाई
गरमी हर बड़ बाढ़त हावय।छइहाँ ला कोनो नइ पावय।
पेंड़ काट सुन्ना कर डारे।मछरी कस अब तड़फे प्यारे।
लकलक लकलक धरती करथे।पाँव रखे मा चटचट जरथे।
बिन गमछा जे बाहिर जावय। सुकसी मछरी कस भूंजावय।
धरे गोंदली बाहिर जाबे।तभ्भे लू ले तँय बँच पाबे।
गन्ना सरबत आमा पाना।गरमी मा सब पीना खाना।
नदिया नरवा सब सूखा गे।देखत देखत जेठ सिरागे।
जाने कब बरसा हर आही।सूखे मन के प्यास बुताही।
आस लगाये ताकत रहिथौं।धीर धरव मँय सब ला कहिथौं।
ऊपर वाला देर करत हे।पर नइ ओ अंधेर करत हे।
आज नही ता काली आही।सब के घर मा खुशियाँ छाही।
धरती दाई हर हरसाही।जब बादर पानी बरसाही।
आस रखव मन मा सबो,आही जी बरसात।
अइसन लकलक धूप के,छटही करिया रात।2।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
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