कुंडलियाँ
माते हाहाकार हे, गरमी हे बिकराल।
सुरुज देव कइसे कहँव,तहीं बिगाड़े हाल।
तहीं बिगाड़े हाल,तपा दे धरती दाई।
सुख्खा नदिया ताल,मचा दे हच करलाई।
पूजा होतिस तोर,दिसम्बर मा जे आते।
अभी हवस जंजाल,घरों घर झगरा माते।1।
ऊर्जा के तँय स्रोत अस,मानत हे संसार।
अतका ऊर्जा फेंक के,धरती ला झन बार।
धरती ला झन बार,जीव सब्बो मरजाही।
पानी जाही सूख, पेड़ मन सब जर जाही।
मनखे का बचपाय,टूटही पुर्जा पुर्जा।
रख ले बने सम्हाल,काम आही सब ऊर्जा।2।
बाढ़े गरमी देख के,मन मा आय विचार।
कुछ कम हे ता चल जही,जादा हे बेकार।
जादा हे बेकार,रहे सरदी या गरमी।
पानी लाथे बाढ़,पाय नइ कोनो नरमी।
हवा बनय तूफान,उखाड़य रुखुवा ठाढ़े।
धन लाथे अभिमान,जेन घर जादा बाढ़े।3।
बिन गरमी के मर जही,जतका रहे सजीव।
गरमी जादा होय ता,बरही जस निरजीव।
बरही जस निरजीव,बात कुछ समझ न आवय।
कइसे करँव उपाय,सबो जिनगी बच जावय।
पेंड़ लगे जे पोठ,सबोझन पाही नरमी।
ऊर्जा तक मिलजाय,पाय सुख सब बिन गरमी।4।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
माते हाहाकार हे, गरमी हे बिकराल।
सुरुज देव कइसे कहँव,तहीं बिगाड़े हाल।
तहीं बिगाड़े हाल,तपा दे धरती दाई।
सुख्खा नदिया ताल,मचा दे हच करलाई।
पूजा होतिस तोर,दिसम्बर मा जे आते।
अभी हवस जंजाल,घरों घर झगरा माते।1।
ऊर्जा के तँय स्रोत अस,मानत हे संसार।
अतका ऊर्जा फेंक के,धरती ला झन बार।
धरती ला झन बार,जीव सब्बो मरजाही।
पानी जाही सूख, पेड़ मन सब जर जाही।
मनखे का बचपाय,टूटही पुर्जा पुर्जा।
रख ले बने सम्हाल,काम आही सब ऊर्जा।2।
बाढ़े गरमी देख के,मन मा आय विचार।
कुछ कम हे ता चल जही,जादा हे बेकार।
जादा हे बेकार,रहे सरदी या गरमी।
पानी लाथे बाढ़,पाय नइ कोनो नरमी।
हवा बनय तूफान,उखाड़य रुखुवा ठाढ़े।
धन लाथे अभिमान,जेन घर जादा बाढ़े।3।
बिन गरमी के मर जही,जतका रहे सजीव।
गरमी जादा होय ता,बरही जस निरजीव।
बरही जस निरजीव,बात कुछ समझ न आवय।
कइसे करँव उपाय,सबो जिनगी बच जावय।
पेंड़ लगे जे पोठ,सबोझन पाही नरमी।
ऊर्जा तक मिलजाय,पाय सुख सब बिन गरमी।4।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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