Monday, 24 June 2019

ताटक छंद

हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कर ना पाता है।
जलता है अंदर हीं अंदर,कहने से घबराता है। 

टूटी फूटी सड़क देख कर,आग बबूला होता है।
सड़क किनारे पेंड़ कटे तो,अंतस मनवा रोता है।
देख गंदगी आसपास में,भीतर से जल जाता है।
हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कर ना पाता है।

बेजा कब्जा किए हजारों,कोई रोक नहीं पाता।
चारागाह नजर ना आए,भारी संकट गहराता।
शहर नगर बस गई झुग्गियाँ, उसको कौन हटाता है।
हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कर ना पाता है।

बिना घूस के काम चले ना,यही ब्यवस्था जारी है।
मध्यम वर्ग सदा से पिसता, ये तकदीर हमारी है।
मौन रहे सब झेल रहे हैं,
हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कह ना पाता है।

अपनी गलती कभी दिखे ना,कलयुग के इंसानों को।
पैसा दे या लड़ के जग से,पूर्ण करे अरमानो को।
उठा दूसरों पर ओ ऊँगली, अपना काम चलाता है।
हर इंसान यहाँ गुस्से में,पर कुछ कर ना पाता है।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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