Monday, 31 January 2022

दोहा हिंदी

दोहे- हिंदी 

पहले जैसे जिंदगी, आज नहीं आसान।  
पग- पग में खतरे दिखे, दो पल का मिहमान।1। 

जिसको घर तू कह रहा, ओ केवल माकान। 
आत्मा सबकी मर गई, रहते हैं शैतान।2। 

भगनी भ्राता या पिता, सब स्वारथ के प्रीत। 
आमदनी जो खत्म हो, छोड़ चलेंगे मीत।3। 

आशा लिए विकाश का, राह तके सब लोग। 
आज समझ में आ रहा, है भाषण का रोग।4। 

कथनी से करनी अलग, देख हुआ था क्रोध। 
फिर झाँसे में आ गए, सचमुच हुए अबोध।5। 

बना- बना कर योजना, लेते माल डकार।  
काम धरातल ना दिखे, कागज में संसार।6। 

नारी की सम्मान का, करते हैं सब बात। 
कहाँ सुरक्षित आज कल, जब घर मे हों घात।7। 

आज सुरक्षित है नहीं, घर इसकुल बाजार। 
किसको दोषी हम कहें, दोषी जब संसार।8। 

संस्कृति अपनी है नहीं, पूरब का है जोर। 
पहले तो इंसान थे, आज हुए सब ढोर।9। 

आत्मा अब मिलते नहीं, कागज का व्यवहार। 
जबतक पैसा हाथ है, तब तक है परिवार।10। 

मिडिया अब परिवेश है, जो करता लाचार। 
मन माफिक कंट्रोल कर, करता है व्यापार।11। 

आशंका से ग्रस्त है, आज सभी इंसान। 
लूट न जाये जिंदगी, हर पग है सैतान।12। 

मुखिया बन के देश का, करना था उद्धार। 
राह भटक कर आज कल, करते हो ब्यापार।13। 

आफत में ला जिंदगी, बचा रहे अब जान। 
खुद मारे मरहम करे, ये कैसा विज्ञान।14। 

डॉक्टर ओ किस काम का, पहले रोग बढ़ाय। 
दवा खिलाने नाम पर, मोटा माल कमाय।15। 

केंशर के अब मर्ज भी, लेते हैं उपचार। 
पर कोरोना से सभी, मान रहे क्यों हार।16। 

पैसे को अब बंद कर, डिजिटल करो उपाय। 
काला धन फिर ना रहे, सब सफेद हो जाय।17। 

भैंस उसी की हो सदा, लाठी जिसके हाथ। 
कभी विरोधी मत बनो, लट्ठ पड़ेंगे माथ।18। 

झूठे हैं तो क्या हुआ, मीठे इनके बोल।  
सुनते हैं सब ध्यान से, मन जाता फिर डोल।19। 

कसके रखो लगाम को, कहीं बिदक ना जाय। 
एन वक्त में ले उड़े, किस्मत पलटा खाय।20। 

बंधन है ये प्रेम का, नाजुक इसके डोर।
आसानी से टूटता, जरा दिए जो जोर।21।  

यात्रा पूरी कर पथिक, गया जहाँ पथ अंत।
क्या पाया क्या खो गया, सोच रहा बन संत।22।

युवाओं के हाथ मे, रहता नहीं भविष्य। 
बिकते देखा नौकरी, आफिस आफिस दृश्य।23। 

धन कुबेर का है भरा, सहीं करे ना भोग। 
स्वारथ कारण हो रहा, हर विभाग को रोग।24। 

पत्थर जिसको कह रहे, वही देवता तुल्य। 
खान बने जो देश में, सारे हैं बहुमूल्य।25। 

काम थमा हर हाथ को, जो अबतक लाचार। 
चूल्हा जब घर-घर जले, तब होगा उद्धार।26। 

भौतिक वादी सब बने, बदल गया परिवेश। 
हिमगिरि पिघले ताप से, बढ़ा रहा है क्लेश।27। 

पीने को अब जल नहीं, रुक-रुक चलता स्वांस। 
जाने पंछी कब उड़े, गले फँसी है फाँस।28। 

कल-युग जो आया यहाँ, है कलयुग का काल। 
बिछा रहा बस मौत है, बना सका ना ढाल।29। 

हमसे प्रकृति नहीं बना, हम प्रकृति की देन। 
जिसने पाला है हमे, क्यों देते हम पेन।30। 

बचपन में की गलतियाँ, अब है पश्चाताप। 
संग जरा तक नोंचता, कितनों करो अलाप।31। 

घर बैठे सब पढ़ रहे, रखे अधूरा ज्ञान। 
अनुसाशन दिखता नहीं, कैसा बना विधान।32। 

पहनो मन मर्जी सभी, पर तन राखो ढाँक। 
मर्यादा अनमोल है, बैरी ना ले झाँक।33।  

बेटी बेटा सब पढ़ें, करो न इसमें भेद। 
अनपढ़ हों यदि एक भी, कहाँ करोगे खेद।34। 

अकड़ रहे किस बात पर, किसका है अभिमान। 
रूप रंग औ सम्पदा, रहे सदा नइ जान।35। 

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार


Thursday, 13 January 2022

जयकारी छंद

चौपई छंद 

गजब गिराये तँय भगवान। 
अब हो जाही सुग्घर धान। 
काल रहिस हे जिहाँ वीरान। 
बारिस कर दे हव वरदान।  

खेत खार सुग्घर हरियाय। 
पानी सँग खातू ला पाय। 
मगन होय झूमय लहराय। 
देख किसनहा मन हरसाय। 

बरसा होइस मुसला धार। 
उर्रा होगे खेती खार। 
नदिया तरिया भरगे झार। 
फँसे नाव कर देहव पार। 

अब तो बाढ़ी ले सब खाय।  
घर-घर घी के दिया जलाय। 
आनी बानी जिनिस लिवाय।
मेंछा तान गजब अँटियाय।  

जय गणपति जय हो गणराज।  
असने हरदम रखिहव लाज।
दुखिया मन के करिहव काज।  
पूजन करबो सुग्घर साज। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

चौपाई

रचना- दिलीप कुमार वर्मा 

कुकरा बासत निकलय घर ले। काँध म नागर लौठी कर ले। 
बइला सँग मा जाय किसनहा। जोतय जाके डोली धनहा। 

तता तता अर्रावत रहिथे। जोर ददरिया गावत रहिथे। 
बइला सँग मा रहे मितानी। दोहा पारय आनी बानी। 

पाही ऊपर पाही बढ़जय। बेरा तक हर ऊपर चढ़जय।  
चेत कहाँ बेरा के राहय। खेत जोतना पूरा चाहय। 

तर-तर तर-तर बहय पछीना। पर साहस भर राखय सीना। 
बइला तक मन संग निभावयँ। पाही पाही जोते जावयँ। 

नरी सुखावय पीयय पानी। जाँगर पेरत करय किसानी। 
बासी धर बाई जब आवय। खाये बेरा ही सुसतावय। 

मिहनत ले ओ अन उपजाथें। सब ला देथे तब खुद खाथें।  
तभे अन्न दाता कहलाथें। देव असन सबझन हा भाथें। 

अपन हाथ मा काम अजब हे। आज काल तो दाम गजब हे।
भटके बर नइ लागय येती। खेती होथे अपनो सेती।

धन्य-धन्य तँय होय किसनहा। तोर रहत मुसकावय धनहा। 
तोरे देहे हम सब खावन। आज तोर सब महिमा गावन। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सार छंद- प्रभु जी

सार छंद- प्रभु जी 

कइसन दुनिया तँय निर्माये, हे प्रभु आज बतादे। 
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज दिखादे। 

कहूँ ठउर मा घाम बहुत हे, कहूँ ठउर मा जाड़ा। 
कहूँ पियासे बिन पानी के, निशदिन दिखे अखाड़ा। 

जिहाँ दिखे पानी के रेला, बाढ़ उहों तँय लादे। 
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज बतादे। 

कहूँ रेत भंडार भरे तँय, कहूँ कटाकट झाड़ी। 
कहूँ बनाये पर्वत खाई, कहूँ बनाये खाड़ी। 

आधा ले जादा दुनिया मा, सागर तहीं बनादे। 
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज बतादे।  

लबरा मन धनवान बने हे, बपुरा इहाँ पिसावय।  
मिहनत कस मन सुक्खा रोटी, चोर मलाई खावय। 

कइसन माया नगरी प्रभु जी, सब ला तँय उलझादे।
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज बतादे। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

 

Wednesday, 12 January 2022

बाल गीत

बाल गीत- सुबह सवेरे 

सुबह सवेरे चिड़िया आई। 
मैं सोया था मुझे जगाई। 

बोली सुबह हुई उठ जाओ। 
देखो सूरज छत पर आओ। 

ठंडी हवा चली इठलाती। 
मध्यम-मध्यम गुनगुन गाती।

हरी-भरी है दुनिया सारी। 
घूम रहे हैं सब नर नारी। 

धुँआ-धुँआ-सा जग भर छाया। 
कैसी है ये प्रभु की माया। 

हर तिनके पर ओस पड़ी है। 
लगता है ज्यों हीर जड़ी है। 

पूर्व दिशा की देखो लाली। 
मंत्र मुग्ध है करने वाली।

ऐसा अवसर अब मत खोना। 
दिन चढ़ते तक कभी न सोना। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सरसी छंद

सरसी छंद-  बोल 

मुँह दे हावय बोले बर ता, फोकट के झन बोल।  
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल। 

जेन विषय के ज्ञान नहीं हे, रख झन कभू विचार। 
बहस चलत हे तेन बीच मा, जाके मुँह झन मार। 

कतका ज्ञान भराये अपने, अन्तस  तनिक टटोल। 
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल। 

लपर-लपर जे बोलत रहिथे, तेन लपरहा ताय। 
बे मतलब बड़बड़ जे करथे, पगला नाम धराय। 

अइसन मन के शब्द हमेसा, होवत फुटहा ढोल।
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल। 

मजा उड़ाले चुप रहि के तँय, करले तनिक विचार।  
सुनके सबके बात समझले, तभे बोलना सार। 

मुँह ले निकले शब्द हमेसा, होवत हे अनमोल। 
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

Saturday, 1 January 2022

कुकुभ छंद

कुकुभ छंद-थपरा 

दुनिया भरके ज्ञान भराये, दाई तोरे थपरा मा। 
जिंदा मन के बात छोड़ तँय, जान फूँक दय खपरा मा। 

चेत बिचेत कभू जे होवय, मार झमाझम पर जाथे। 
आलस के अँधियारी छाये, आँखी जग ले बर जाथे। 

छमता ले जादा भर जाथे, पाँच साल के बपरा मा। 
दुनिया भरके ज्ञान भराये, दाई तोरे थपरा मा। 

खेल कूद सब छोड़े बइठे, नइ हावय संगी साथी। 
थपरा देखत डर के मारे, लीलत हे सइग्घो हाथी। 

तोर रहत लइका ले होरा, कहाँ भूँजाही छपरा मा।  
दुनिया भरके ज्ञान भराये, दाई तोरे थपरा मा। 

परथे जब ये गाल चटाचट, पाँचो अँगड़ी छप जाथे। 
जिनगी के ये रेल तहाँ फिर, पटरी छोड़े कब जाथे। 

मया गजब के तको भराये, दाई तोरे थपरा मा। 
जिंदा मन के बात छोंड़ तँय, जान फूँक दय खपरा मा। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

आल्हा

आल्हा 

सड़क बने ले सुन रे बाबू, तोर कभू नइ होय विकास। 
ये ब्यापारी मन के रसता, जे लूटे बर आही पास। 

तोर करा गाड़ी ना घोड़ा, कब जाबे तँय होय सवार। 
मोटर गाड़ी ब्यापारी के, पइसा ओ कर देही पार। 

सड़क बने ले आही ओ हर, लालच दे ले लेही खेत। 
तँय बनजाबे नौकर ओखर, तोर मुठा मा भरही रेत। 

ठेला ले ओ कर सुरुवाते, बन जाही धीरे से सेठ। 
बेघर ओ तोला कर देही, झन रह बाबू निच्चट ठेठ। 

तोर पिसाही जाँगर पूरा, ओ बइठे करही आराम।
सोना ला जब तँय उपजाबे, ओ लेही कौड़ी कस दाम।   

सड़क बने ले मानत हावँव, गाँव शहर बढ़िया जुड़ जाय।  
छिन मा आना छिन मा जाना, सुविधा के अंबार लगाय। 

चिंता अतके मोर हवय जी, गाँव शहर कस झन बन जाय। 
भोला भाला मोर गँवइहा, झन शहरी ओ रंग चढ़ाय। 

कहिथें भारत गाँव बसत हे, संस्कृति राखय जिहाँ सहेज। 
शहरी छइहाँ पड़ जाये ले, लूट पाट हो जाही तेज।

छोड़ किसानी नव जवान मन, शहर डहर सब जही खिंचाय। 
माटी के सेवा खातिर फिर, खून पछीना कोन बहाय। 

सड़क बनाये गाँव गाँव मा, सोंच रखे जी होय विकास। 
पर मोला तो गड़बड़ लागे, झन हो जावय सबो विनाश। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार


लावणी गीत

लावणी छंद गीत 

पुरखा मन के सपना दाई, आवत बेरा लागिस ओ।
एक नवम्बर दो हजार के, भाग हमर हर जागिस ओ। 

छत्तीसगढ़ हे नाम ह दाई, छत्तीसगढ़ही बोली हे। 
तोर अंग मा पर्वत जंगल, धनहा भाठा डोली हे। 
छत्तीसगढ़िया के मिहनत ले, घोर अँधेरा भागिस ओ। 

 हरियर लुगरा तन मा पहिरे, अछरा हर लहरावत हे। 
सुआ ददरिया कर्मा पंथी, पडकी मैना गावत हे। 
नाचत कूदत जिनगी लागे, अब सुराज हर आगिस ओ। 

तोर सवाँगा खातिर दाई, गाँव सड़क चमकावत हन। 
तोर प्यास बर पानी खातिर, नदिया बांध बनावत हन। 
तोर दिए हीरा लोहा ले, कोठी हमर भरागिस ओ। 

कोना-कोना के विकास बर, जिला बने बत्तीस हवय। 
पर बस्तर अबतक नइ सुधरे, तेखर हमला टीस हवय।  
अपने भाई बहिनी ऊपर, गोला काबर दागिस ओ। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

रोला छंद

रोला छंद 

कर ले पूजा पाठ, बचे नइ हे जिनगानी। 
जाँगर सबो सिराय, सिरागे तोर जवानी। 
ताका झाँकी छोड़, भक्ति के रसता धर ले। 
अपनो सरग सँवार, ध्यान दे पूजा कर ले । 

बचपन बीते खेल, जवानी मा इतराये। 
पइसा ला भगवान, समझ के खूब कमाये। 
अब होगे लाचार, तभो नइ कहना माने। 
मोर मोर सब मोर, कहे तँय नइ पहिचाने। 

अब तो रसता देख, लिवाये कब ओ आही। 
बिन पूछे ओ दूत, धरे तोला ले जाही। 
रहि जाही सब चीज, संग काहीं नइ जावय। 
जेन जपे श्री राम, धाम बस वो ही पावय। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

चौपाई

रचना- दिलीप कुमार वर्मा 

कुकरा बासत निकलय घर ले। काँध म नागर लौठी कर ले। 
बइला सँग मा जाय किसनहा। जोतय जाके डोली धनहा। 

तता तता अर्रावत रहिथे। जोर ददरिया गावत रहिथे। 
बइला सँग मा रहे मितानी। दोहा पारय आनी बानी। 

पाही ऊपर पाही बढ़जय। बेरा तक हर ऊपर चढ़जय।  
चेत कहाँ बेरा के राहय। खेत जोतना पूरा चाहय। 

तर-तर तर-तर बहय पछीना। पर साहस भर राखय सीना। 
बइला तक मन संग निभावयँ। पाही पाही जोते जावयँ। 

नरी सुखावय पीयय पानी। जाँगर पेरत करय किसानी। 
बासी धर बाई जब आवय। खाये बेरा ही सुसतावय। 

मिहनत ले ओ अन उपजाथें। सब ला देथे तब खुद खाथें।  
तभे अन्न दाता कहलाथें। देव असन सबझन हा भाथें। 

अपन हाथ मा काम अजब हे। आज काल तो दाम गजब हे।
भटके बर नइ लागय येती। खेती होथे अपनो सेती।

धन्य-धन्य तँय होय किसनहा। तोर रहत मुसकावय धनहा। 
तोरे देहे हम सब खावन। आज तोर सब महिमा गावन। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

सार छंद

सार छंद-गैस

गैस छोड़ना बुरी बात पर, राखे कोन सम्हाले। 
बन जाता है पेट फ़टे तक, चाहे जो भी खाले। 

गुड़-गुड़ गुड़-गुड़ पेट करे फिर, सर लगता है भारी। 
सीने में ज्वाला सा धधके, लगता चले कटारी। 

ऐसे में अब तुम्ही बताओ,कौन मुसीबत पाले। 
फुस-फुस ढिस-ढुस ढाँय ढड़ा-ढम, हर जन इसे निकाले। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

नवतप्पा

कुकुभ छंद  नवतप्पा

झुलसाथे गरमी हर भारी,जब नवतप्पा हर आथे। 
एसी कूलर काम न आवय, घर भट्ठी कस बन जाथे। 

हरर हरर हर कोती होथे,गरम हवा के मारे ले। 
लू लगजाही तइसे रहिथे,बाहिर पाँव उतारे ले। 

लकलक लकलक भुइँया करथे,पानी सब सूखा जाथे। 
झुलसाथे गरमी हर भारी,जब नवतप्पा हर आथे।  

नव दिन के नवतप्पा संगी,रंग दिखावय बड़ भारी।
कभू घाम हे चिलचिल चिलचिल,कभू छाय हे अँधियारी।  
गरजत घुमड़त बादर आके,पानी तक बरसाजाथे। 
झुलसाथे गरमी हर भारी,जब नवतप्पा हर आथे।

दिलीप कुमार वर्मा  नायक
बलौदा बाज़ार

राधे राधे

आल्हा भजन

बिहना राधे संझा राधे, रतिहा राधे राधे बोल। 
दिन भर राधे राधेराधे, बोलत अंतस के पट खोल। 

राधे राधे बोल नहाले, पूजा करले राधे बोल। 
काम करत मा राधे राधे, झन करबे संगी तँय झोल। 
राह चलत जेला तँय मिलबे, राधे बोलत बने टटोल। 
दिन भर राधे राधे राधे, बोलत अन्तस के पट खोल। 

खेत खार तरिया नदिया मा, जेती चाहे तेती डोल। 
राधे राधे बोल बोल के, कान सबो के तँय रस घोल। 
अमरित ले ज्यादा हे मीठा, राधे नाम बड़ा अनमोल। 
बिहना राधे संझा राधे, रतिहा राधे राधे बोल। 

लइका पन या रहे जवानी, होय बुढापा राधे बोल। 
हर पग मा सुख दुख के डेरा, उमर तराजू रख झन तोल। 
कोन जनी कब का हो जाही, कब फुट जाही सुख के ढोल। 
बिहना राधे संझा राधे, रतिहा राधे राधे बोल। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

आजाद

आल्हा

मिलिस हवय आजादी जब ले,
हम सब होगे हन आजाद। 
कहाँ मानथन कखरो कहना,
करत हवन सब ला बरबाद। 

का सपना देखिन पुरखा मन,
जेखर बर आजादी लाय। 
माटी खातिर पगला बन के,
लड़त-लड़त सब जान गँवाय। 

स्वारथ मा सब याद करत हन,
घड़ियाली आँसू बोहाय। 
भाषण झाड़त रहिथन दिनभर,
दिन निकलत सबकुछ बिसराय। 

सरग बरोबर सपना देखे, 
नरक सहीं करदे हन हाल। 
सबो डहर कचरा फइले हे, 
भारत माँ दिखथे कंगाल। 

हिजगा पारी मा सब छोड़न, 
हमला का करना हे बोल। 
अवसर पाके कतको झन मन, 
करत हवँय जी भारी झोल। 

अपन पाँव मा मार कुल्हाड़ी, 
बोहावत हन आँसू धार।
बछर पछत्तर तको बीत गे, 
नइ होइस हे बेड़ा पार। 

चला मनाबो परब अजादी, 
कर लेथन थोरिक चल याद। 
तहाँ रोज कस ढर्रा चलही, 
काबर की हम हन आजाद। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार