आल्हा
मिलिस हवय आजादी जब ले,
हम सब होगे हन आजाद।
कहाँ मानथन कखरो कहना,
करत हवन सब ला बरबाद।
का सपना देखिन पुरखा मन,
जेखर बर आजादी लाय।
माटी खातिर पगला बन के,
लड़त-लड़त सब जान गँवाय।
स्वारथ मा सब याद करत हन,
घड़ियाली आँसू बोहाय।
भाषण झाड़त रहिथन दिनभर,
दिन निकलत सबकुछ बिसराय।
सरग बरोबर सपना देखे,
नरक सहीं करदे हन हाल।
सबो डहर कचरा फइले हे,
भारत माँ दिखथे कंगाल।
हिजगा पारी मा सब छोड़न,
हमला का करना हे बोल।
अवसर पाके कतको झन मन,
करत हवँय जी भारी झोल।
अपन पाँव मा मार कुल्हाड़ी,
बोहावत हन आँसू धार।
बछर पछत्तर तको बीत गे,
नइ होइस हे बेड़ा पार।
चला मनाबो परब अजादी,
कर लेथन थोरिक चल याद।
तहाँ रोज कस ढर्रा चलही,
काबर की हम हन आजाद।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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