आल्हा भजन
बिहना राधे संझा राधे, रतिहा राधे राधे बोल।
दिन भर राधे राधेराधे, बोलत अंतस के पट खोल।
राधे राधे बोल नहाले, पूजा करले राधे बोल।
काम करत मा राधे राधे, झन करबे संगी तँय झोल।
राह चलत जेला तँय मिलबे, राधे बोलत बने टटोल।
दिन भर राधे राधे राधे, बोलत अन्तस के पट खोल।
खेत खार तरिया नदिया मा, जेती चाहे तेती डोल।
राधे राधे बोल बोल के, कान सबो के तँय रस घोल।
अमरित ले ज्यादा हे मीठा, राधे नाम बड़ा अनमोल।
बिहना राधे संझा राधे, रतिहा राधे राधे बोल।
लइका पन या रहे जवानी, होय बुढापा राधे बोल।
हर पग मा सुख दुख के डेरा, उमर तराजू रख झन तोल।
कोन जनी कब का हो जाही, कब फुट जाही सुख के ढोल।
बिहना राधे संझा राधे, रतिहा राधे राधे बोल।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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