Saturday, 1 January 2022

कुकुभ छंद

कुकुभ छंद-थपरा 

दुनिया भरके ज्ञान भराये, दाई तोरे थपरा मा। 
जिंदा मन के बात छोड़ तँय, जान फूँक दय खपरा मा। 

चेत बिचेत कभू जे होवय, मार झमाझम पर जाथे। 
आलस के अँधियारी छाये, आँखी जग ले बर जाथे। 

छमता ले जादा भर जाथे, पाँच साल के बपरा मा। 
दुनिया भरके ज्ञान भराये, दाई तोरे थपरा मा। 

खेल कूद सब छोड़े बइठे, नइ हावय संगी साथी। 
थपरा देखत डर के मारे, लीलत हे सइग्घो हाथी। 

तोर रहत लइका ले होरा, कहाँ भूँजाही छपरा मा।  
दुनिया भरके ज्ञान भराये, दाई तोरे थपरा मा। 

परथे जब ये गाल चटाचट, पाँचो अँगड़ी छप जाथे। 
जिनगी के ये रेल तहाँ फिर, पटरी छोड़े कब जाथे। 

मया गजब के तको भराये, दाई तोरे थपरा मा। 
जिंदा मन के बात छोंड़ तँय, जान फूँक दय खपरा मा। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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