सार छंद- प्रभु जी
कइसन दुनिया तँय निर्माये, हे प्रभु आज बतादे।
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज दिखादे।
कहूँ ठउर मा घाम बहुत हे, कहूँ ठउर मा जाड़ा।
कहूँ पियासे बिन पानी के, निशदिन दिखे अखाड़ा।
जिहाँ दिखे पानी के रेला, बाढ़ उहों तँय लादे।
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज बतादे।
कहूँ रेत भंडार भरे तँय, कहूँ कटाकट झाड़ी।
कहूँ बनाये पर्वत खाई, कहूँ बनाये खाड़ी।
आधा ले जादा दुनिया मा, सागर तहीं बनादे।
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज बतादे।
लबरा मन धनवान बने हे, बपुरा इहाँ पिसावय।
मिहनत कस मन सुक्खा रोटी, चोर मलाई खावय।
कइसन माया नगरी प्रभु जी, सब ला तँय उलझादे।
कोन जघा सुख के छइयाँ हे, मोला आज बतादे।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
अनुपम रचना गुरुजी
ReplyDelete