Saturday, 1 January 2022

नवतप्पा

कुकुभ छंद  नवतप्पा

झुलसाथे गरमी हर भारी,जब नवतप्पा हर आथे। 
एसी कूलर काम न आवय, घर भट्ठी कस बन जाथे। 

हरर हरर हर कोती होथे,गरम हवा के मारे ले। 
लू लगजाही तइसे रहिथे,बाहिर पाँव उतारे ले। 

लकलक लकलक भुइँया करथे,पानी सब सूखा जाथे। 
झुलसाथे गरमी हर भारी,जब नवतप्पा हर आथे।  

नव दिन के नवतप्पा संगी,रंग दिखावय बड़ भारी।
कभू घाम हे चिलचिल चिलचिल,कभू छाय हे अँधियारी।  
गरजत घुमड़त बादर आके,पानी तक बरसाजाथे। 
झुलसाथे गरमी हर भारी,जब नवतप्पा हर आथे।

दिलीप कुमार वर्मा  नायक
बलौदा बाज़ार

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