Saturday, 1 January 2022

सार छंद

सार छंद-गैस

गैस छोड़ना बुरी बात पर, राखे कोन सम्हाले। 
बन जाता है पेट फ़टे तक, चाहे जो भी खाले। 

गुड़-गुड़ गुड़-गुड़ पेट करे फिर, सर लगता है भारी। 
सीने में ज्वाला सा धधके, लगता चले कटारी। 

ऐसे में अब तुम्ही बताओ,कौन मुसीबत पाले। 
फुस-फुस ढिस-ढुस ढाँय ढड़ा-ढम, हर जन इसे निकाले। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा 
बलौदाबाजार

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