सार छंद-गैस
गैस छोड़ना बुरी बात पर, राखे कोन सम्हाले।
बन जाता है पेट फ़टे तक, चाहे जो भी खाले।
गुड़-गुड़ गुड़-गुड़ पेट करे फिर, सर लगता है भारी।
सीने में ज्वाला सा धधके, लगता चले कटारी।
ऐसे में अब तुम्ही बताओ,कौन मुसीबत पाले।
फुस-फुस ढिस-ढुस ढाँय ढड़ा-ढम, हर जन इसे निकाले।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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