सरसी छंद- बोल
मुँह दे हावय बोले बर ता, फोकट के झन बोल।
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल।
जेन विषय के ज्ञान नहीं हे, रख झन कभू विचार।
बहस चलत हे तेन बीच मा, जाके मुँह झन मार।
कतका ज्ञान भराये अपने, अन्तस तनिक टटोल।
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल।
लपर-लपर जे बोलत रहिथे, तेन लपरहा ताय।
बे मतलब बड़बड़ जे करथे, पगला नाम धराय।
अइसन मन के शब्द हमेसा, होवत फुटहा ढोल।
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल।
मजा उड़ाले चुप रहि के तँय, करले तनिक विचार।
सुनके सबके बात समझले, तभे बोलना सार।
मुँह ले निकले शब्द हमेसा, होवत हे अनमोल।
जभे जरूरी रहय बोलना, तब्भे तँय मुँह खोल।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
वाह वाह गुरुजी
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