Saturday, 1 January 2022

लावणी गीत

लावणी छंद गीत 

पुरखा मन के सपना दाई, आवत बेरा लागिस ओ।
एक नवम्बर दो हजार के, भाग हमर हर जागिस ओ। 

छत्तीसगढ़ हे नाम ह दाई, छत्तीसगढ़ही बोली हे। 
तोर अंग मा पर्वत जंगल, धनहा भाठा डोली हे। 
छत्तीसगढ़िया के मिहनत ले, घोर अँधेरा भागिस ओ। 

 हरियर लुगरा तन मा पहिरे, अछरा हर लहरावत हे। 
सुआ ददरिया कर्मा पंथी, पडकी मैना गावत हे। 
नाचत कूदत जिनगी लागे, अब सुराज हर आगिस ओ। 

तोर सवाँगा खातिर दाई, गाँव सड़क चमकावत हन। 
तोर प्यास बर पानी खातिर, नदिया बांध बनावत हन। 
तोर दिए हीरा लोहा ले, कोठी हमर भरागिस ओ। 

कोना-कोना के विकास बर, जिला बने बत्तीस हवय। 
पर बस्तर अबतक नइ सुधरे, तेखर हमला टीस हवय।  
अपने भाई बहिनी ऊपर, गोला काबर दागिस ओ। 

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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