आल्हा
सड़क बने ले सुन रे बाबू, तोर कभू नइ होय विकास।
ये ब्यापारी मन के रसता, जे लूटे बर आही पास।
तोर करा गाड़ी ना घोड़ा, कब जाबे तँय होय सवार।
मोटर गाड़ी ब्यापारी के, पइसा ओ कर देही पार।
सड़क बने ले आही ओ हर, लालच दे ले लेही खेत।
तँय बनजाबे नौकर ओखर, तोर मुठा मा भरही रेत।
ठेला ले ओ कर सुरुवाते, बन जाही धीरे से सेठ।
बेघर ओ तोला कर देही, झन रह बाबू निच्चट ठेठ।
तोर पिसाही जाँगर पूरा, ओ बइठे करही आराम।
सोना ला जब तँय उपजाबे, ओ लेही कौड़ी कस दाम।
सड़क बने ले मानत हावँव, गाँव शहर बढ़िया जुड़ जाय।
छिन मा आना छिन मा जाना, सुविधा के अंबार लगाय।
चिंता अतके मोर हवय जी, गाँव शहर कस झन बन जाय।
भोला भाला मोर गँवइहा, झन शहरी ओ रंग चढ़ाय।
कहिथें भारत गाँव बसत हे, संस्कृति राखय जिहाँ सहेज।
शहरी छइहाँ पड़ जाये ले, लूट पाट हो जाही तेज।
छोड़ किसानी नव जवान मन, शहर डहर सब जही खिंचाय।
माटी के सेवा खातिर फिर, खून पछीना कोन बहाय।
सड़क बनाये गाँव गाँव मा, सोंच रखे जी होय विकास।
पर मोला तो गड़बड़ लागे, झन हो जावय सबो विनाश।
रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
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