Wednesday, 2 October 2019

दुमदार दोहे

जानवर के हाल

काँव काँव कउवा करे,बइठ अटारी मोर।
लगथे पहुना आय घर,तभे करत हे शोर।
बरा बर दार फिलोहूँ।
नही ते रोटी पोहूँ।

भाँव भाँव भूँकत हवय,कुकुर गली मा आज।
लगथे चोर हमाय गे,अपन करे बर काज।
धरे लाठी मँय जाहूँ।
चोर ला खूब ठठाहूँ।

म्याऊँ म्याऊँ बोल के,घर मा खुसरत आय।
दूध दही ला देख के,तुरते चट करजाय।
कहाँ मुसुवा ओ पाथे।
बिलाई बड़ा सताथे।

जब ले जंगल काट के,कर दिन हे वीरान।
तब ले देखव बेंदरा,करे अबड़ परसान।
घरो घर रार मचाथे।
साग भाजी ला खाथे।

भर्री भाँठा छेंक के,धनहा सबो बनाय।
गरुवा चारा बर सखा,बता कहाँ अब जाय।
खेत भर घूमय खावय।
सड़क मा रात बितावय।

शेर मार के खाल ला, बेंचय ऊँचा दाम।
हाथी दाँत निकाल के,अपन बनावय काम।
कहाँ जंगल मा राजा।
बने मनखे के खाजा।

उत्पादन के मोह मा, खातू देत ढकेल।
कीरा मारे के दवा,डारत हावय पेल।
अन्न मा जहर ह भरगे।
चिरइया मन सब मरगे।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सुखी सवैया


अरछी परछी कुरिया अँगना, अब छोंड़ गली कइसे मँय जावँव।
पुतरी पुतरा चुलहा चुकिया,सब छोंड़ सखी कइसे बिसरावँव।
तरिया डबरी नरवा नदिया,बखरी धनहा ल कहाँ अब पावँव।
ससुराल गए सब छूट जही,भगवान जनी कब मैं हर आवँव।

घर के भिथिया खिड़की खटिया,जठना कुरसी सब जानत हावय। 
कब कोन कहाँ कइसे रइही, कहना सब मोर ल मानत हावय।  
जब जेन कहौं घर आवत हे, सब मोर ददा धर लानत हावय।
नइ जावँ सखी घर छोड़ कभू,सब आहट ला पहिचानत हावय।

दिलीप कुमार वर्मा

आल्हा

भोले बाबा

भोले बाबा तहीं बतादे,कइसे तोर दरस बर आवँ।
छाती लोटत साँप हवय ता,कइसे तोला जल ल चढ़ावँ।

लगे महीना सावन के हे,बून्द बून्द बर तरसे धान।
बाती जइसन सबो बरागे,माथा धर के रोय किसान।
अइसन भारी विपदा मा मँय,कइसे उखरा रेंगत जावँ।
छाती लोटत साँप हवय ता,कइसे तोला जल ल चढाँव।

बम भोले के ये जयकारा,मोर हलक तक अब नइ आय।
काँवर पानी धर के रेंगव,मोरो मन ला अब नइ भाय।
तोर चढ़े परसाद बता दे,कइसे के अब मँय हर खावँ।
छाती लोटत साँप हवय ता,कइसे तोला जल ल चढाँव।

मंदिर के घण्टा हर भोले,रहि रहि के मोला चिड़हाय।
तोपवँ कतको कान तभो ले,गूंज गूंज के भीतर आय।
देदे भोले अब परसादी, तोर दरस बिन रह नइ पावँ।
छाती लोटत साँप तभो ले,तोर दरस बर मँय हर आवँ।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

रोला छंद


(1)
भर्री भाँठा खेत, सबो परिया पर जाही।
छत्तीसगढ़ मा देख, मानसुन जे नइ आही।
मरजाही सब पेंड़, घाँस मन तको सुखाही।
जीव सबो मरजाय, बता फिर कोन बँचाही।।

(2)
मनखे जावव चेत, पेंड़ ला अभी लगालव।
बोर करव सब बंद, कुँआ तरिया अपनालव।
नदिया देवव बाँध, नहर ला अउ बगरालव।
हरियर हरियर खेत, खुसी ला सबझन पालव।।

(3)
लहराही जब पेंड़, खुसी के बादर छाही।
गरजत घुमड़त आय, पोठ के जल बरसाही।
हरसाही सब जीव, बने सब भोजन पाही।
तब ही मनखे तोर, मेहनत हा रँग लाही।।

छंदकार - दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

दोहा


तड़फय मछरी कस सबो, पानी बिना किसान।
कलप कलप रोवत हवय, देख भुंजावत धान।1।

अजर अमर ओ मन रहय, नेक करे जे काम।
दुख सुख के साथी बने, सेवक जेखर नाम।2।

पग पग मा काँटा मिले, सत मारग जे जाय।
बाधा टारत जे चले, अवतारी कहलाय।3।

दरपन कस सच्चा बनव, कहदव मुँह मा बात।
बिगड़े बात सँवार लय, झन पावय आघात।4।

कलम चला के देख लव, ये बड़का हथियार।
बन्दुक जे नइ कर सके, कलम करय सरकार।5।

हाथ लिखाये नइ रहय, करम करे ओ पाय।
बिना हाथ के मन तको, सरग अमर दिखलाय।6।

बटकी मा झन छोडबे, एक़्क़ो दाना भात।
मान करे नइ अन्न के, ते मन खाथे लात।7।

बिन मंजिल जे रेंगथे, भटक जथे ओ राह।
मिहनत के फल तब मिले, रख मन में जब चाह।8।

रचना - दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ़

कुंडलियाँ

  लोटा

खाली लोटा मा भरव,जिनगी के कुछ सार।
ताम झाम ला देख के,झन भरहू बेकार।
झन भरहू बेकार,बोझ बस बाढ़त जाथे।
असल परिक्षा बेर,कहाँ फिर सुरता आथे।
मल मल तन चमकाय,बनाये कँचन थाली।
कचरा भर पछताय,गये ता लोटा खाली।1।

लोटा हे बड़ काम के,सच में करव विचार।
कलश बना पूजा करव,पहिरा देवव हार।
पहिरा देवव हार,लगा के चोवा चन्दन।
दीपक बने जलाव,करव अंतस ले वंदन।
अस्थि कलश बन जाय,रहे लोटा नइ खोटा।
काम अबड़ ओ आय,रहे जे घर मा लोटा।2।

चल दय लोटा ला धरे,करे सत्य के खोज।
सार सार लोटा भरे,जे मिल जावय रोज।
जे मिलजावय रोज,करय फिर मंथन भारी।
कचरा देवय फेंक,खोज फिर राखय जारी। 
रोज लगावय ध्यान,तेन हर ओला बल दय।
लावय जग बर सार,जेन लोटा धर चल दय।3।

धर के लोटा आय जे,कम ओला झन आँक।
हाथ दिखा के देख ले,जिनगी ला दय झाँक।
जिनगी ला दय झाँक,बता दय करम कहानी।
का हे बढ़िया काम,करे का तँय मनमानी।
करे सत्य के खोज,लाय हावय ओ भर के।
पाय हवय ओ सार,गये जे लोटा धर के।4।

लोटा मा जब छेद हे,कहाँ रुके फिर सार।
कतको भर ले लान के,हो मिहनत बेकार।
हो मिहनत बेकार,रहे खाली के खाली।
सबो कमाई तोर,उड़ा देवय घरवाली।
कर ले थोरिक चेत,कती ले हावय खोटा।
ओला बने सुधार,तभे भर पाही लोटा।5।

ये तन लोटा जान ले,हावय दस ठन छेद।
सब्बो होथे काम के,अलग अलग हे भेद।
अलग अलग हे भेद,समे मा ये खुल जाथे।
इही छेद के देन, जीव मन जीवन पाथे।
साफ रखव सब छेद,स्वस्थ रह जाही तनमन।
चमचम ले चमकाव,रहे लोटा जस ये तन।6।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

कुंडलियाँ


(1)
सागर के लहरा असन, लहरावव दिनरात।
कल-कल नदिया कस बहव, कोयल जइसन बात।
कोयल जइसन बात, गाव झरना कस गाना। 
चलव हवा के संग, करव जी आना जाना।
जिनगी हे दिन चार, जियव सब दू मन आगर।
अंतस लाव उफान,लाय जस लहरा सागर।

(2)
सुरता आवत हे बहुत, दिन गुजरे कुछ साल।
टुटहा घर कुरिया रहय, बत्तर राहय हाल।
बत्तर राहय हाल, गरीबी रहना बसना।
कोदो कुटकी खान, रहय नइ खटिया दसना। 
कपहा राहय पेंठ, चिराये राहय कुरता। 
चड्डी ना बनियान, आज सब आवय सुरता।

(3)
मानत नइ हे बात ला, बड़का भइया मोर।
दारू पीथे रोज के, अब्बड़ करथे शोर।
अब्बड़ करथे शोर, करत हे झगरा भारी।
लइका मन चिथियाय, रोत हे घर के नारी।
पढ़े लिखे हुसियार, होय नुकसानी जानत।
पर होगे लाचार, कहे ला ओ नइ मानत।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

सवैया

चकोर
सास कहाँ कहिथे कुछ जी,अब तो बहु के चलथे सरकार।
सास रहे बपुरी दुबके,खटिया न मिले न मिले घर द्वार।
देत परोसत हे जइसे, तइसे उन खावत हे मन मार।
खेदत हे कतको घर ले,बपुरी निकले अब रोवत हार।

मदिरा
स्वारथ मा सब प्रेम करे,बिन स्वारथ प्रेम कहाँ मिलथे।
आवक हे जब सास करा,तब ही बहु के मन हा खिलथे।
जेकर आवक हा नइ हे, तब तो बहु के मन हा हिलथे।
रोज चलावत बाण रहे,कहिके कुछ भी छतिया छिलथे।

मदिरा
काम करे जब सास इहाँ,लइका रखवार बने घर के।
माँजत हे टठिया मन ला,अउ लीपत हे फरिया धर के।
जाँगर के चलते खुस हे, बहु काम तियारत हे भर के।
काँचत हे कपड़ा लकता,रहिथे घर सास तभो डर के।

किरीट
बाढ़ जथे लइका मन हा,अउ सास रहे सब जाँगर खोवय।
सोय रथे खटिया धर के,बपुरी चुपके चुपके अब रोवय।
हे भगवान उठा जलदी,कहिथे अब मोर सरेख न होवय।
स्वारथ के सब प्रेम रहे,बिन स्वारथ मा समसान पठोवय।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

लावणी छंद

जीभ

मुँह के भीतर रहय जीभ हा,तेकर कथा सुनावत हँव।
दुख पीरा अउ काम धाम ला,सुनलव आज बतावत हँव। 

नरम नरम नाजुक ये जिभिया,सब के काम बनावत हे।
बोले अउ खाये के खातिर,काम सबो के आवत हे।

रहे बतीसी मुँह के भीतर,हरपल जे चाबत रहिथे।
जीभ बिचारी बाँच बाँच के,पीरा ओखर बड़ सहिथे।

कभू कभू सप्पड़ मा आवय,लाल बाल तब हो जावय।
अंतस ले तब आह निकल जय,खून तको बाहिर आवय।

दाँत कटाकट चाबत रहिथे,मनखे जब भोजन खावय।
जीभ बिचारी पेल पेल के,दाँत बीच खाना लावय।

करू मीठ अम्मठ अउ नुनछुर,चुप्पुर तक ला बतलाथे।
जीभ भरोसा सबो जीव मन,स्वाद लेत खाना खाथे।

लार लान के बने मिला दय,लुगदी भोजन बन जाथे।
तभ्भे खाना भीतर कोती, आसानी से लीलाथे। 

आखर आखर बोले खातिर,जीभ अबड़ नाचत रहिथे।
कभू दाँत तालू ला छू के,साफ साफ आखर कहिथे।

कतको कहिथे कैची जइसन,जीभ बात ला काटत हे।
कतको कहिथे बोल बोल के,भेजा तक ला चाँटत हे।

गरुवा मन के लम्बा जिभिया, नाक तको ला साफ करे।
साँप निकाले जीभ अपन ता,मुसुवा तक ला भाँप डरे।

मन माफिक जे स्वाद मिले ता,चाँट चाँट जिभिया लाथे।
पेट भरे तब ले मनखे हर,ठूँस ठूँस खाना खाथे।  

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

चौपई छंद

हरेली

आय हरेली के त्यौहार,हरियर दीखय खेती खार।
बइठ सगा झन तँय मन मार,मिहनत नइ होवय बेकार।

नाँगर रपली राँपा लान,जेन भरोसा बोये धान।
धो के फूल चढावव जान,पूजव येला देव समान।

गुरहा चीला बने बनाव,सब अवजार म भोग लगाव।
श्रद्धा के अंतस रख भाव,सबझन सुग्घर आशिष पाव।

गरुवा बर तँय आंटा सान, अउ खम्हार के ले आ पान।
नून डार लोंदी तँय लान,गरुवा खाही अमरित जान।

जंगल के कांदा दशमूल, बने पकावव रख के चूल।
सबो खवावव हो झन भूल,गरुवा के मिटही सब सूल।

रो रो लइका करय अलाप,ओखर बर तँय गेंड़ी खाप। 
रचरिच रचरिच करही जाप,चिखला के नइ पावय ताप।

नोनी बाबू खुडवा खेल,मल्ल युद्ध कस पेलम पेल।
फुगड़ी खोखो बिल्लस ठेल, आही देखे रेलम रेल।

छत्तीसगढ़ के हरे तिहार,जेमा खुशियाँ हे भरमार।
जुरमिल रहिथे सब नर नार, जानय अब येला संसार।

रचनाकार- दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार छत्तीसगढ

चौपई छंद

नशा

नशा नाश करथे ये जान,तन हो जाते मरे समान।
झन रहिबे तँय हर अनजान,नुकसानी ला अब पहिचान।

सब्जी के बड़ बाढ़े भाव,चटनी ले अब काम चलाव।
बोरे बासी सबझन खाव, दार भात ला दूर हटाव।

चिखला के अब दिन हर आय,देख पाँव हर फिसलत जाय।
नोनी मटक मटक इतराय,भद ले गिरगे सबो सनाय।

येती सुख्खा ओती बाढ़, हवा चले ले ठिठुरे हाड़।
पेंड़ सूख गे देखव ठाड़,धूंका मा बड़ लागय जाड़।

लइका कूद कूद इतराय,बरसा ले ओ नइ घबराय।
बाहिर कोती नाचत जाय, बरसा के ओ मजा उड़ाय।

गरजत हे बाहिर झन जाव, बिजुरी ले थोरिक डर्राव।
घर मा बइठे जान बचाव,नइ ते बिजुरी तन मा खाव।

करिया बादर जब जब आय,रद रद रद पानी बरसाय।
सब किसान के मन हरसाय,बाढ़ आय ले सब पछताय। 

ताटक छंद

ताटक छंद

सूरज सरजी छुट्टी में है,वर्षा मैडम आई है।
कोर्स हुआ कम्प्लीट मैम का,फिर भी क्लाश लगाई है।

कॉपी पूरा लिख डाले हैं,जगा यहाँ ना खाली है।
फिर भी नियमित मैम पढ़ाती,कैसे कहूँ दिवाली है। 

रखे मार्जिन जो कॉपी थे,उसमें भी लिख डाले हैं।
बड़ी भूल कर बैठे हमतो,तभी पड़े ये लाले हैं।

सूरज सर की करें पतिक्षा,आके जान बचाएँगे।
वर्ना कॉपी में लिक्खा जो,सारे ओ मिट जाएँगे।

सूरज सर जी जल्दी आओ,अभी परीक्षा होना है।
रहा अगर परिणाम शून्य तो,बरस बरस भर रोना है।

वर्षा की जब पड़े जरूरत,सूरज सर जी आते थे।
वर्षा मैडम कभी कभी आ,थोड़ा आश बँधाते थे।

अब सूरज का काम यहाँ है,तो वर्षा फिर आई है।
रखा समय का ध्यान नही औ, आके हमे सताई है।

हैड मेम दुर्गा आई पर,वर्षा मेंम कहाँ माने।
अपने ऑफिस बैठी दुर्गा,सुंदर सा छतरी ताने। 

लगता है शाला खुलने का,समय बढ़ाया जाएगा।
तब ही वर्षा औ सूरज का,समय मेंच हो पाएगा।

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार