लोटा
खाली लोटा मा भरव,जिनगी के कुछ सार।
ताम झाम ला देख के,झन भरहू बेकार।
झन भरहू बेकार,बोझ बस बाढ़त जाथे।
असल परिक्षा बेर,कहाँ फिर सुरता आथे।
मल मल तन चमकाय,बनाये कँचन थाली।
कचरा भर पछताय,गये ता लोटा खाली।1।
लोटा हे बड़ काम के,सच में करव विचार।
कलश बना पूजा करव,पहिरा देवव हार।
पहिरा देवव हार,लगा के चोवा चन्दन।
दीपक बने जलाव,करव अंतस ले वंदन।
अस्थि कलश बन जाय,रहे लोटा नइ खोटा।
काम अबड़ ओ आय,रहे जे घर मा लोटा।2।
चल दय लोटा ला धरे,करे सत्य के खोज।
सार सार लोटा भरे,जे मिल जावय रोज।
जे मिलजावय रोज,करय फिर मंथन भारी।
कचरा देवय फेंक,खोज फिर राखय जारी।
रोज लगावय ध्यान,तेन हर ओला बल दय।
लावय जग बर सार,जेन लोटा धर चल दय।3।
धर के लोटा आय जे,कम ओला झन आँक।
हाथ दिखा के देख ले,जिनगी ला दय झाँक।
जिनगी ला दय झाँक,बता दय करम कहानी।
का हे बढ़िया काम,करे का तँय मनमानी।
करे सत्य के खोज,लाय हावय ओ भर के।
पाय हवय ओ सार,गये जे लोटा धर के।4।
लोटा मा जब छेद हे,कहाँ रुके फिर सार।
कतको भर ले लान के,हो मिहनत बेकार।
हो मिहनत बेकार,रहे खाली के खाली।
सबो कमाई तोर,उड़ा देवय घरवाली।
कर ले थोरिक चेत,कती ले हावय खोटा।
ओला बने सुधार,तभे भर पाही लोटा।5।
ये तन लोटा जान ले,हावय दस ठन छेद।
सब्बो होथे काम के,अलग अलग हे भेद।
अलग अलग हे भेद,समे मा ये खुल जाथे।
इही छेद के देन, जीव मन जीवन पाथे।
साफ रखव सब छेद,स्वस्थ रह जाही तनमन।
चमचम ले चमकाव,रहे लोटा जस ये तन।6।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार
No comments:
Post a Comment