Wednesday, 2 October 2019

कुंडलियाँ


(1)
सागर के लहरा असन, लहरावव दिनरात।
कल-कल नदिया कस बहव, कोयल जइसन बात।
कोयल जइसन बात, गाव झरना कस गाना। 
चलव हवा के संग, करव जी आना जाना।
जिनगी हे दिन चार, जियव सब दू मन आगर।
अंतस लाव उफान,लाय जस लहरा सागर।

(2)
सुरता आवत हे बहुत, दिन गुजरे कुछ साल।
टुटहा घर कुरिया रहय, बत्तर राहय हाल।
बत्तर राहय हाल, गरीबी रहना बसना।
कोदो कुटकी खान, रहय नइ खटिया दसना। 
कपहा राहय पेंठ, चिराये राहय कुरता। 
चड्डी ना बनियान, आज सब आवय सुरता।

(3)
मानत नइ हे बात ला, बड़का भइया मोर।
दारू पीथे रोज के, अब्बड़ करथे शोर।
अब्बड़ करथे शोर, करत हे झगरा भारी।
लइका मन चिथियाय, रोत हे घर के नारी।
पढ़े लिखे हुसियार, होय नुकसानी जानत।
पर होगे लाचार, कहे ला ओ नइ मानत।

रचनाकार-दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

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