Wednesday, 2 October 2019

लावणी छंद

जीभ

मुँह के भीतर रहय जीभ हा,तेकर कथा सुनावत हँव।
दुख पीरा अउ काम धाम ला,सुनलव आज बतावत हँव। 

नरम नरम नाजुक ये जिभिया,सब के काम बनावत हे।
बोले अउ खाये के खातिर,काम सबो के आवत हे।

रहे बतीसी मुँह के भीतर,हरपल जे चाबत रहिथे।
जीभ बिचारी बाँच बाँच के,पीरा ओखर बड़ सहिथे।

कभू कभू सप्पड़ मा आवय,लाल बाल तब हो जावय।
अंतस ले तब आह निकल जय,खून तको बाहिर आवय।

दाँत कटाकट चाबत रहिथे,मनखे जब भोजन खावय।
जीभ बिचारी पेल पेल के,दाँत बीच खाना लावय।

करू मीठ अम्मठ अउ नुनछुर,चुप्पुर तक ला बतलाथे।
जीभ भरोसा सबो जीव मन,स्वाद लेत खाना खाथे।

लार लान के बने मिला दय,लुगदी भोजन बन जाथे।
तभ्भे खाना भीतर कोती, आसानी से लीलाथे। 

आखर आखर बोले खातिर,जीभ अबड़ नाचत रहिथे।
कभू दाँत तालू ला छू के,साफ साफ आखर कहिथे।

कतको कहिथे कैची जइसन,जीभ बात ला काटत हे।
कतको कहिथे बोल बोल के,भेजा तक ला चाँटत हे।

गरुवा मन के लम्बा जिभिया, नाक तको ला साफ करे।
साँप निकाले जीभ अपन ता,मुसुवा तक ला भाँप डरे।

मन माफिक जे स्वाद मिले ता,चाँट चाँट जिभिया लाथे।
पेट भरे तब ले मनखे हर,ठूँस ठूँस खाना खाथे।  

दिलीप कुमार वर्मा
बलौदाबाजार

No comments:

Post a Comment